११० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
“व्यापक अर्थात् द्रव्य-परिणामी पोताना परिणामनो कर्ता होय छे; व्याप्य अर्थात् ते परिणाम द्रव्ये कर्या. जेमां (एक सत्त्वमां) आवो भेद करवामां आवे तो थाय छे, न करवामां आवे तो नथी थतो. जीवसत्त्वथी पुद्गलद्रव्यनुं सत्त्व भिन्न छे, निश्चयथी व्याप्यव्यापकता नथी. भावार्थ एम छे के जेम उपचारमात्रथी द्रव्य पोताना परिणामनो कर्ता छे, ते ज परिणाम द्रव्यथी करायेलो छे तेम अन्यद्रव्यनो कर्ता अन्यद्रव्य उपचारमात्रथी पण नथी, कारण के एक सत्त्व नथी, भिन्न सत्त्व छे.”
ज्ञाता एवो आत्मा पोताना स्वपरप्रकाशक परिणामनो कर्ता अने ए परिणाम एनुं कर्म-ए उपचारमात्रथी छे. “निश्चयथी तो पर्याय पर्यायथी (पोताथी) थई छे. द्रव्यथी पर्याय थई छे एम कह्युं ए तो भेदथी उपचार कर्यो छे. निश्चयथी तो निर्विकारी निर्मळ परिणाम स्वयंसिद्ध थया छे.” त्यां आत्मा ते निर्मळ परिणामनो कर्ता अने ते निर्मळ परिणाम आत्मानुं कर्म ए उपचारमात्रथी छे. तथा रागनी अने जडनी क्रियानो कर्ता आत्मा छे ए तो उपचारमात्रथी पण नथी. अहा! आवी वात बीजे कयांय नथी. निर्मळ परिणाम ते व्याप्य अने द्रव्य आत्मा व्यापक ए उपचारथी छे, परमार्थ नथी. अने शरीरनो, रागनो, व्यवहारनो कर्ता आत्मा छे ए तो उपचारमात्रथी पण नथी.
व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय छे. एटले के कर्ता अने कर्म अभिन्न होय छे. आत्मा वस्तु शुद्ध त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायक द्रव्य ते व्यापक अने सम्यग्दर्शन आदि निर्मळ परिणाम ते एनुं व्याप्य एटले कर्म छे. परंतु आत्मा कर्ता अने एनाथी भिन्न पुण्य-पापना भाव एनुं व्याप्य कर्म छे एम कदी होई शके नहि; केमके पुण्य-पाप आदि भाव अतत्स्वरूप छे. पुण्य- पापना भाव विभावस्वरूप छे अने ते त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकस्वभावनी अपेक्षाए अतत्स्वरूप छे. अहाहा...! भाई, जेने व्यवहार साधन कह्युं छे एवा व्यवहाररत्नत्रयना भाव अतत्स्वरूप छे. तेने साधन कह्युं ए तो ज्ञान करवा माटे उपचारमात्र कथन छे. खरेखर ते साधन छे ज नहि. झीणी वात, भाई!
आत्मा त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायकस्वभावी ध्रुव वस्तु छे. तेनुं व्याप्यव्यापकपणुं पोताना निर्मळ स्वभावमां (अभिन्न) छे. शुद्ध ज्ञायकना लक्षे जे निर्मळ वीतरागी पर्याय उत्पन्न थाय ते एनुं व्याप्य अने पोते व्यापक थईने ते निर्मळ व्याप्य कर्मने करे छे. परंतु पुण्य-पाप आदि जे विभावभाव थाय छे तेनां क्षेत्र अने भाव भिन्न होवाथी निश्चयथी ते अतत्स्वरूप छे. तेथी आत्माने रागादिथी व्याप्यव्यापकपणुं नथी. घणी गंभीर वात!
तथा व्याप्यव्यापकभावना संभव विना कर्ताकर्मनी स्थिति केवी? व्याप्यव्यापकभावना अभावे रागनो कर्ता आत्मा अने राग आत्मानुं कर्म ए स्थिति केवी? जुओ! आ धर्म केवी रीते थाय ते कहे छे. निर्मळ ज्ञानस्वभावी चिन्मात्र वस्तु जे आत्मा तेनी जेने द्रष्टि थई अने जे अतत्स्वरूप एवा रागथी-व्यवहारना विकल्पथी भिन्न पडयो ते