Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७प ] [ १०९

जुओ! निमित्त मेळवी शकातुं नथी एक वात; निमित्त होय छे ते कार्यने नीपजावतुं नथी बीजी वात; निमित्तनुं ते काळे जे ज्ञान थाय छे ते ज्ञानमां ते निमित्त होवा छतां निमित्त ते आत्मानुं कार्य नथी अने जे ज्ञान थयुं ते निमित्तनुं कार्य नथी. अहो! आवुं वस्तुतत्त्व बतावीने आचार्य अमृतचंद्रदेवे एकलां अमृत रेडयां छे! आचार्य अमृतचंद्रदेव छेल्ले एम कहे छे के आ शास्त्र (टीका) अमे बनाव्युं छे एम नथी. टीका करवानो जे राग थयो ते अमारुं कार्य नथी. रागनुं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान रागनुं कार्य नथी. राग संबंधी जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान ज्ञायक आत्मानुं कार्य छे. तेमां राग निमित्त हो, पण ते निमित्त राग ज्ञातानुं व्याप्य नथी. भगवान आत्मा स्वयं ज्ञानस्वरूपी वस्तु छे. ते पोते पोताना सामर्थ्यथी पोताने कारणे पोतानुं (स्वनुं अने रागनुं परनुं) ज्ञान करे छे; निमित्तना कारणे ज्ञान करे छे एम छे ज नहि. प्रश्नः– आ सामे लाकडुं छे तो लाकडानुं ज्ञान थाय छे ने? उत्तरः– ना, एम नथी. ज्ञान स्वतंत्र ते काळे पोताथी थयुं छे. आत्मा स्वपरप्रकाशक ज्ञानपणे स्वतंत्र परिणमे छे. ते ज्ञान आत्मानुं कार्य छे. अन्य निमित्त हो भले, पण ते निमित्त आत्मानुं कार्य नथी. ज्ञान ज आत्मानुं कार्य छे; व्यवहार-रत्नत्रयनो राग आत्मानुं व्याप्य कर्म नथी. आवो वीतरागनो मार्ग बहु झीणो छे.

* * *

हवे आ ज अर्थना समर्थननुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

* कळश ४९ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘व्याप्यव्यापकता तदात्मनि भवेत्’ व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय, ‘अतदात्मनि अपि न एव’ अतत्स्वरूपमां न ज होय, अने ‘व्याप्यव्यापकभावसंभवम् ऋते’ व्याप्यव्यापकभावना संभव विना ‘कर्तृकर्मस्थितिः का’ कर्ताकर्मनी स्थिति केवी? अर्थात् कर्ताकर्मनी स्थिति न ज होय. जुओ! वस्तुना स्वभावमां स्वभाव ते त्रिकाळ व्यापक छे अने एनी पर्याय ते व्याप्य छे. आवुं व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय छे, अतत्स्वरूपमां नहि. राग अने शरीरादि पर वस्तु ते तत्स्वरूप नथी. अहाहा...! भगवान आत्मा शुद्ध चैतन्यघनवस्तु प्रभु ज्ञाननो पिंड छे. एनो व्याप्यव्यापकभाव तत्स्वरूपमां ज होय छे एम अहीं कहे छे. एटले पोते व्यापक अने एनी निर्मळ निर्विकारी दशा ए एनुं व्याप्य छे, पण पोते व्यापक अने रागादि परवस्तु एनुं व्याप्य एम छे ज नहि; केमके अतत्स्वरूपमां आत्मानुं व्याप्यव्यापकपणुं संभवित ज नथी. भाई! आ तो सर्वज्ञ परमात्मा अरिहंतदेवनी कहेली मूळ वात छे. व्यापक एटले कर्ता अने व्याप्य एटले कर्म-कार्य तत्स्वरूपमां ज होय छे. खरेखर तो आत्मा व्यापक अने निर्मळ पर्याय एनुं व्याप्य-ए पण उपचार छे. कळशटीकामां आ कळशना अर्थमां नीचे प्रमाणे कह्युं छे-