१०८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ छे. एमां व्यवहारनुं निमित्त होवा छतां, ज्ञेयज्ञायकसंबंधनो व्यवहार होवा छतां ते राग ज्ञातानुं व्याप्य नथी. व्यवहार ज्ञेय छे अने आत्मा ज्ञायक छे आटलो संबंध व्यवहारमात्र होवा छतां ते राग आत्मानुं कार्य-कर्म नथी.
जुओ! सामे हीरा होय तो हीरानुं ज्ञान थाय, कोलसा होय तो कोलसानुं ज्ञान थाय, राग होय तो रागनुं ज्ञान थाय अने द्वेष होय तो द्वेषनुं ज्ञान थाय. पण आ बधुं छे माटे अहीं तेनुं ज्ञान थाय छे एम नथी. ज्ञान थयुं तेमां ए बधुं निमित्त छे, पण एनाथी ज्ञान थयुं एम छे ज नहि. आवी सत्य वात सांभळवा मळे नहि ते अरेरे! सत्यपंथे के दि’ जाय? जुओने, केटली वात करी छे! आ सामे समयसार छे एनुं जे ज्ञान थयुं ते ज्ञान पोताथी थयुं छे. ते ज्ञानमां समयसार निमित्त छे छतां ते (समयसार शास्त्र) आत्मानुं व्याप्य कर्म नथी. भाई! वस्तुनी स्थिति ज आवी छे.
प्रश्नः– आप समयसार केम वांचो छो? पद्मपुराण केम नहि? आटलो निमित्तनो फेर छे के नहि?
उत्तरः– अरे भगवान! एम वात नथी. समयसारना शब्दो अने तेना वांचननो विकल्प ते आत्मा वडे स्वतंत्रपणे थता ज्ञानमां निमित्त छे, पण निमित्त छे माटे अहीं एनुं ज्ञान थयुं छे एम नथी. आत्मानुं भान थतां जे स्वपरप्रकाशक ज्ञानना परिणाम थया तेनो आत्मा पोते स्वतंत्र व्यापक थईने कर्ता छे. भाई! भाव तो सूक्ष्म छे, पण भाषा सादी छे; समजे तो समजाय एम छे, प्रभु!
जेने स्वभावनी द्रष्टि थई छे ते ज्ञानीने हेयबुद्धिए (स्वाध्याय आदि) व्यवहारना जे विकल्प ऊठे ते विकल्प तेना ज्ञाननुं ज्ञेय छे अने आत्मा ज्ञायक छे. आवो ज्ञेय-ज्ञायकनो संबंध व्यवहारमात्र होवा छतां ते (स्वाध्याय आदि) परज्ञेय आत्मानुं व्याप्य नथी, अर्थात् ते ज्ञानीनुं कार्य नथी. तेने प्रगट थयेलुं स्वपरप्रकाशक ज्ञान ज ज्ञातानुं व्याप्य कर्म छे.
आत्मा पोताना स्वभावनी द्रष्टिरूपे परिणमतां तेनी ज्ञाननी पर्यायमां व्यवहारनो विकल्प निमित्त होवा छतां ज्ञाननुं परिणमन ते निमित्तथी थयुं नथी, पण ज्ञाताथी ज स्वतंत्रपणे थयेलुं छे. तथा ते निमित्त ज्ञातानुं व्याप्य कर्म नथी पण ज्ञान ज ज्ञातानुं व्याप्य कर्म छे. पोताना स्वभावना शुद्ध उपादानथी ते ज्ञाननुं कार्य थयुं छे.
प्रश्नः– निमित्त अने उपादान एम कार्य प्रति बे कारण होय छे ने?
उत्तरः– निमित्त अने उपादान एम बे कारणोथी कार्य थाय ए वातनो अहीं निषेध छे. बे कारण कह्यां छे ए तो कथनमात्र छे. कार्यना काळे निमित्त कोण छे एम बीजी चीजनी उपस्थितिनुं ज्ञान कराववा त्यां बे कारण कह्यां छे. वास्तविक कारण तो एक उपादान ज छे.