Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७६ ] [ ११९

सामान्यपणे कर्तानुं कर्म त्रण प्रकारनुं कहेवामां आवे छे-निर्वर्त्य, विकार्य अने प्राप्य. कर्ता वडे, जे प्रथम न होय एवुं नवीन कांई उत्पन्न करवामां आवे ते कर्तानुं निर्वर्त्य कर्म छे. कर्ता वडे, पदार्थमां विकार-फेरफार करीने जे कांई करवामां आवे ते कर्तानुं विकार्य कर्म छे. कर्ता, जे नवुं उत्पन्न करतो नथी तेम ज विकार करीने पण करतो नथी, मात्र जेने प्राप्त करे छे ते कर्तानुं प्राप्य कर्म छे.

जीव पुद्गलकर्मने नवीन उपजावी शकतो नथी कारण के चेतन जडने केम उपजावी शके? माटे पुद्गलकर्म जीवनुं निर्वर्त्य कर्म नथी. जीव पुद्गलमां विकार करीने तेने पुद्गलकर्मरूपे परिणमावी शकतो नथी कारण के चेतन जडने केम परिणमावी शके? माटे पुद्गलकर्म जीवनुं विकार्य कर्म पण नथी. परमार्थे जीव पुद्गलने ग्रहण करी शकतो नथी कारण के अमूर्तिक पदार्थ मूर्तिकने कई रीते ग्रहण करी शके? माटे पुद्गलकर्म जीवनुं प्राप्य कर्म पण नथी. आ रीते पुद्गलकर्म जीवनुं कर्म नथी अने जीव तेनो कर्ता नथी. जीवनो स्वभाव ज्ञाता होवाथी ज्ञानरूपे परिणमतो पोते पुद्गलकर्मने जाणे छे; माटे पुद्गलकर्मने जाणता एवा जीवनो परनी साथे कर्ताकर्मभाव केम होई शके? न ज होई शके.

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समयसार गाथा ७६ः मथाळुं

हवे पूछे छे के पुद्गलकर्मने जाणता एवा जीवने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव (कर्ताकर्मपणुं) छे के नथी? तेनो उत्तर कहे छेः-

* गाथा ७६ः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं व्याप्यलक्षणवाळुं पुद्गलना परिणामस्वरूप जे कर्म, तेनामां पुद्गलद्रव्य पोते अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतुं, ते-रूपे परिणमतुं अने ते-रूपे ऊपजतुं थकुं, ते पुद्गलपरिणामने करे छे.’

जुओ! शिष्यनो एम प्रश्न छे के पुद्गलपरिणामरूप कर्मने एटले के रागादिने जाणतां ज्ञानीने तेनी साथे कर्ताकर्मभाव छे के नहि? जेवो राग थाय, जे देहनी स्थिति होय तेने ए रीते जाणे एटलो संबंध छे, पण आत्माने तेनी साथे कर्ताकर्मपणुं छे के नथी? तो कहे छे के ना; पुद्गलनुं-रागादिनुं कर्ताकर्मपणुं पुद्गलमां छे. जे जे रागादि अवस्था थाय ते ते ज्ञानी जाणे पण तेनी साथे ज्ञानीने कर्ताकर्मभाव नथी. पुद्गलपरिणामरूपकर्म साथे पुद्गलने कर्ताकर्मपणुं छे.

एक समयनी अवस्थाना त्रण प्रकार-प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य. एवुं व्याप्यलक्षणवाळुं पुद्गलना परिणामस्वरूप कर्म एटले के रागस्वरूप जे कर्तानुं कार्य छे तेमां पुद्गल अंतर्व्यापक थईने आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहतुं, रागरूपे परिणमतुं, रागरूपे