१२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ ऊपजतुं थकुं पुद्गलपरिणामने करे छे. आ दया, दान, व्रत आदिना शुभरागमां पुद्गल व्यापीने ते परिणामने करे छे. व्यवहाररत्नत्रयना रागनी आदिमां पुद्गल, मध्यमां पुद्गल अने अंतमांय पुद्गल छे; रागनी आदिमां जीव छे एम नथी.
एक बाजु एम कहे के रागना, मिथ्यात्वना परिणाम जीवना छे अने वळी ते पुद्गलना परिणाम छे एम अहीं कहे ते केवी रीते छे? भाई! अहीं तो जेने ज्ञायकस्वभावनी द्रष्टि थई छे एवा ज्ञानीनी वात छे. जे काळे जे रागनी, शरीरनी, भाषानी, संयोगनी जे रीते अवस्था थाय तेने ते रीते ज्ञानी जाणे छतां जाणनार ज्ञायक कर्ता अने रागादि एनुं कर्म एम नथी. रागमां पुद्गल अंतर्व्यापक थईने रागने करे छे. राग छे तो जीवनी पर्याय पण अहीं तो जेने द्रव्यबुद्धि थई छे, जे ज्ञाताभावे परिणम्यो छे एवा ज्ञानीनी वात छे. कहे छे के पर्यायमां जे राग छे तेनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल छे, आत्मा नथी. ज्ञानीने जे स्वभावद्रष्टि थई छे ते द्रष्टिनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा छे. सम्यग्दर्शननी पर्यायनी आदि-मध्य-अंतमां ज्ञायकस्वभावी भगवान आत्मा छे अने रागनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल छे. बे वस्तु (ज्ञान अने राग) जुदी पाडी ने. कहे छे के राग जे पुद्गलपरिणाम छे तेना आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल छे अने तेनो कर्ता पुद्गल छे.
ज्ञानीनी कर्ताकर्मनी स्थिति शुं छे अने जड पुद्गलनी दशा शुं छे एनी आ वात चाले छे. व्यवहाररत्नत्रयनो जे शुभराग छे एमां पुद्गलद्रव्य अंतर्व्यापक थईने ते कर्म करे छे; जीवनुं ते व्याप्य एटले कर्म नथी. प्राप्य एटले जे थाय तेने पहोंची वळवुं, विकार्य एटले बदलवुं, निर्वर्त्य एटले उपजवुं-एम त्रणे एक ज कार्य छे. शुभराग जे थयो तेने पुद्गल पहोंची वळ्युं छे ते तेनुं प्राप्य कर्म, पूर्वनो राग बदलीने शुभराग थयो ते पुद्गलनुं विकार्य कर्म अने शुभराग जे नवो उपज्यो ते पुद्गलनुं निर्वर्त्य कर्म छे. विकारना परिणाम-शुभरागादिना परिणामना आदि-मध्य- अंतमां पुद्गल व्यापे छे. आदिमां आत्मा छे अने पछी राग थाय छे एम नथी. आदि-मध्य- अंतमां पुद्गल व्यापीने रागने ग्रहे छे, भगवान आत्मा नहि. ते विकार्य कार्य पुद्गलनुं छे अने पुद्गल रागपणे उपजे छे तेथी पुद्गलनुं ते निर्वर्त्य कर्म छे. स्वभाव उपर जेनी द्रष्टि पडी छे तेनुं राग ते प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य कर्म नथी. बहु सूक्ष्म वात.
प्रश्नः– जो पुद्गल राग करतो होय तो जीव तेने शी रीते अटकावे?
उत्तरः– अटकाववानो सवाल छे कयां? ज्ञानी तो जे राग थाय तेने जाणे छे एम कह्युं छे. जे राग थाय ते पुद्गलनुं प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य कर्म छे अने ज्ञानी एने ज्ञानमां जाणे छे बस एटली वात छे. शुभराग ते मारुं कर्तव्य नहि, पण एने जाणनारी जे ज्ञाननी पर्याय छे ते मारुं कार्य छे एम मानतो ज्ञानी साक्षीभावे परिणमे छे.