समयसार गाथा ७६ ] [ १२१ पोताना त्रिकाळी शुद्ध ज्ञाता-द्रष्टा स्वभावनो अनुभव थयो छे तेथी ज्ञानी पोताने जे ज्ञाता- द्रष्टाना परिणाम थया छे तेमां रागने जाणे छे बस; अने ते जाणवाना परिणाम एनुं कार्य छे, पण राग एनुं कार्य नथी. आवी सूक्ष्म वात छे.
हवे कहे छे-‘आम पुद्गलद्रव्य वडे करवामां आवता पुद्गलपरिणामने ज्ञानी जाणतो होवा छतां, जेम माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, घडाने ग्रहे छे, घडारूपे परिणमे छे अने घडारूपे उपजे छे तेम, ज्ञानी पोते बाह्यस्थित एवा परद्रव्यना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतो नथी, ते- रूपे परिणमतो नथी, अने ते-रूपे ऊपजतो नथी.’
राग के जे पुद्गलना परिणामस्वरूप कर्म छे तेनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल व्याप्युं छे. पुद्गलथी जे उत्पन्न थयुं, तेनाथी जे बदल्युं अने तेनाथी ऊपज्युं एवा पुद्गलपरिणामस्वरूप कर्मने ज्ञानी जाणतो होवा छतां तेने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी अने ते-रूपे ऊपजतो नथी. स्वस्वरूपने जाणतां, जे प्रकारनो राग थाय तेने जाणवाना ज परिणाम ज्ञानीने थाय छे.
जेम माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने घडारूपे थाय छे; अर्थात् घडारूप प्राप्यने माटी ग्रहे छे, घडारूपे माटी परिणमे छे, अने माटी घडारूपे ऊपजे छे तेम ज्ञानी पोते बाह्य स्थित पुण्यना भाव, शुभभाव जे परद्रव्यना परिणाम छे तेने जाणतो होवा छतां तेने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी, ते-रूपे ऊपजतो नथी. ज्ञानस्वभावी वस्तु आत्मा छे. ते रागादि परद्रव्यने जाणवानुं काम करे, पण तेने ग्रहतो नथी जुओ, व्यवहाररत्नत्रयनो जे शुभराग छे तेने अहीं बाह्यस्थित कह्यो छे. तेने जे पोतानो माने छे ते बहिरात्मा छे. अहीं कहे छे-जेम माटी घडामां व्यापीने ऊपजे छे तेम धर्मी रागमां व्यापीने ऊपजतो नथी, रागने ग्रहतो नथी अने रागने नीपजावतो नथी.
राग छे ते परद्रव्यना एटले पुद्गलना परिणाम छे. देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो विकल्प, शास्त्र भणवाना वलणनो विकल्प, पंचमहाव्रतना पालननो विकल्प-ए शुभराग छे. तेने पुद्गल ग्रहे छे, पुद्गल ऊपजावे छे. चैतन्यस्वरूपी भगवान आत्मा ए रागने जाणे पण तेने ग्रहतो नथी, ऊपजावतो नथी. तेनो ते कर्ता नथी. जुओ, धर्मी जीवने धर्म केम थाय एनी आ वात छे. भगवान आत्मा पूर्णानंदस्वरूप छे एवी द्रष्टि थईने ज्यां प्रत्यक्ष अनुभव थयो त्यां धर्मी, राग जे पुद्गलना परिणाम छे तेमां व्यापीने तेने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी, ते-रूपे ऊपजतो नथी.
जुओ! जे वखते जे राग थवानो छे ते थयो छे ते प्राप्य, वळी ते ज राग पलटीने थयो छे माटे ते विकार्य अने ते ज राग नवो ऊपज्यो माटे तेने निर्वर्त्य