१२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ कहे छे. पर्याय तो एक ज छे, तेनुं कथन त्रण प्रकारे छे. ते रागनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल व्यापीने ते रागने करे छे; पण तेने पोतामां रहीने जाणतो धर्मी तेमां (रागमां) व्यापीने तेने करे छे एम नथी. ‘निश्चय-व्यवहारना लोको वांधा उठावे छे के-अभ्यंतर अने बाह्य सामग्री-बंने होय तो कार्य थाय. परंतु एम नथी, भाई! रागनी सामग्री अने आनंदनी निर्मळ सामग्री-ए बंने थईने शुं आत्मानुं-धर्मनुं कार्य करे? एम कदीय नथी. आत्मानुं कार्य जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्ररूप शुद्ध रत्नत्रयना परिणाम तेमां एकलो आत्मा पोते अंतर्व्यापक थईने, तेना आदि- मध्य-अंतमां आत्मा पोते व्यापीने, ते परिणामने करे छे. माटी जेम घडाने ग्रहे छे तेम धर्मी रागने ग्रहतो नथी, रागने बदलावतो नथी, रागपणे ऊपजतो नथी. ते ते रागने ते ते काळे धर्मी पोतामां रहीने जाणे छे बस. आवो वीतरागनो मार्ग छे. आत्मा वीतरागस्वरूप ज छे अने तेनो आवो मार्ग छे. वीतरागी परिणाममां, तेना आदि-मध्य-अंतमां आत्मा पोते व्यापीने ते वीतरागी दशाने ग्रहे छे, पोते वीतरागदशारूपे परिणमे छे अने पोते ते-रूपे ऊपजे छे. परंतु रागने आत्मा ग्रहतो नथी, रागरूपे ते परिणमतो नथी, रागरूपे पोते ऊपजतो नथी. व्यवहाररत्नत्रयना परिणामने धर्मी पकडतो नथी. तेनुं जे ज्ञान थाय तेमां ज्ञानी व्यापे छे. ज्ञानीनुं प्राप्य, विकार्य, निर्वर्त्य कर्म ज्ञान छे, राग नहि. प्रश्नः– आ तो आपे निश्चयथी कह्युं, पण व्यवहार बतावो ने? उत्तरः– भाई! व्यवहारथी कांई आनाथी विरुद्ध वात छे एम नथी. राग जे व्यवहार छे ते निमित्त छे एम एनुं ज्ञान कराव्युं छे. प्रमाणना विषयमां व्यवहारनुं पण ज्ञान कराव्युं छे. त्यां निश्चयनी वात राखीने व्यवहारनुं ज्ञान कराव्युं छे. आत्मा रागना परिणामने करतो नथी, तेमां ते व्यापतो नथी, तेने ऊपजावतो नथी. ते रागने जाणवाना पोताना ज्ञानपरिणामने करतो, ग्रहतो, ऊपजावतो तेमां (ज्ञानमां) व्यापे छे. भाई! प्रमाणमां आ निश्चयनी वात राखीने पछी जे राग छे तेनाथी कार्य थाय एम आरोप करीने उपचारथी कथन कर्युं छे. आ तो वीतराग सर्वज्ञथी सिद्ध थयेलो मार्ग छे. भगवान आत्मा पोते ज सर्वज्ञस्वरूप छे. अहाहा...! सर्वज्ञ एटले ज्ञ-स्वभाव, ज्ञ-शक्ति, ‘ज्ञ’ जेनो भाव, ‘ज्ञ’ जेनुं स्वरूप छे एवो भगवान आत्मा जेनी द्रष्टिमां आव्यो ते धर्मी, ज्ञ-स्वभावमांथी उत्पन्न थता, ते काळे रागने जाणवाना ज्ञानपरिणाममां पोते आदि-मध्य-अंतमां व्यापे छे. एटले के ए राग छे माटे अहीं रागने जाणवाना परिणाम थया छे एम नथी. रागने जाणवाना परिणामनी आदिमां पोते ज छे. एनी आदिमां राग हतो अने तेथी जाणवाना परिणाम थया एम नथी. रागने जाणे एवा ज्ञानना परिणामनी आदि-मध्य-अंतमां प्रभु आत्मा ज छे. ‘माटे, जो के ज्ञानी पुद्गलकर्मने जाणे छे तोपण, प्राप्य, विकार्य अने