Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 895 of 4199

 

समयसार गाथा ७६ ] [ १२३ निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म, तेने नहि करता एवा ते ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव नथी.’

ज्ञान रागने जाणे माटे ज्ञान कर्ता अने राग एनुं कर्म एम नथी. तथा राग कर्ता अने जाणवाना ज्ञानपरिणाम एनुं कर्म एम पण नथी. भाई! वस्तुस्थितिने प्रसिद्ध करनारी आ ७प थी ७९ सुधीनी गाथाओ अलौकिक छे. अहाहा...! द्रष्टि त्रिकाळी ध्रुव द्रव्य उपर पडतां, राग अने पर्यायनी द्रष्टि छूटतां, भगवान आत्मा पोते प्रसिद्ध थाय छे के-हुं तो जाणनार-देखनार आत्मा छुं. रागनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्म-एवा कर्ताकर्मभावना स्वरूपे हुं छुं ज नहि. अहो! परम अद्भुत वात संतोए करी छे!

आवुं सांभळवा मळवुं मुश्केल होय एटले व्यवहारना रसिया लोकोने आवुं वीतरागी तत्त्व न समजाय. परंतु भाई! व्यवहार एटले निमित्त, व्यवहार एटले राग, व्यवहार एटले दुःख, व्यवहार एटले आकुळता, व्यवहार एटले अस्थिरता-आम व्यवहारनां अनेक नाम छे. अस्थिरताना परिणामने (रागने) शाश्वत् स्थिर एवो भगवान आत्मा जाणवानुं काम करे. ते जाणवाना-ज्ञानना परिणामनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा पोते व्यापे छे. एटले राग छे माटे ज्ञाननुं कार्य थयुं एम नथी. तथा ज्ञान रागमां प्रसरीने रागने जाणे छे एम पण नथी. अहा! गजब वात छे!

व्यवहारना शुभरागना जे परिणाम छे ते आकुळतामय छे, दुःखरूप छे. व्यवहाररत्नत्रयनो जे राग छे ते दुःख छे. छहढालामां आवे छे के-

‘राग आग दहै सदा तातै समामृत सेईए’

जे राग छे ते दुःख छे. तेने! निश्चयनुं साधन कहेवुं ए तो उपचारमात्र कथन छे, वस्तुस्वरूप नथी. आवुं सांभळीने केटलाक पोकारी ऊठे छे के-‘एकांत छे, एकांत छे;’ पण भाई! भगवान आत्मा पोताना स्वभावमां जाय त्यारे सम्यक् एकांत थाय छे. त्यारे रागनुं परज्ञेय तरीके ज्ञान थाय तेने अनेकांत कहे छे. मार्ग तो आ छे, भाई!

राग अने चैतन्यस्वभाव बे भिन्न चीज छे एवा भेदज्ञानना अभावे अरे भाई! तुं चोरासीना अवतारमां अनंतकाळ रखडयो. हवे तो भेदज्ञान कर. अहीं कहे छे के जे व्यवहाररत्नत्रयनो राग छे ते क्षणिक छे, चैतन्यस्वभावथी विरुद्ध भाव छे, विभाव छे. ए विभावनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल व्यापे छे, आत्मा नहि. जुओ, शुभराग छे ते चैतन्यनी-जीवनी पर्याय छे, ते कांई परनी नथी. पण ए पर्याय त्रिकाळी जे चैतन्यस्वभाव छे तेनी जातनी नथी, माटे स्वभावनी द्रष्टिमां एने अचेतन गणीने पुद्गलपरिणाम कही छे.

प्रश्नः– आत्मा निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्गने साधे छे एम शास्त्रमां आवे छे ने?

उत्तरः– हा, आवे छे. पण एनो अर्थ शुं? निश्चय ए ज एनुं कार्य छे, अने