१२४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ एमां ते व्यापे छे; व्यवहारमां ते व्यापतो नथी. परंतु व्यवहारनो राग ए जातनो त्यां (सहचर) होय छे. वळी निश्चयनो आरोप व्यवहार उपर करीने व्यवहार साधक कहेवामां आव्यो छे. खरेखर तो रागथी भिन्न पडतां प्रज्ञानो अनुभव जे थयो ते साधक छे. स्वरूपनो साधक तो अनुभव छे. प्रज्ञाछीणी ते साधन छे एम मोक्ष अधिकारमां कह्युं छे. जे अनुभवनो विषय त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य छे ते अनुभव-प्रज्ञाछीणी स्वरूपनो साधक छे. त्यां शुभरागने सहचर देखीने आरोप आपीने उपचारथी साधक कह्यो छे. तेने जो यथार्थ मानी ले तो द्रष्टि विपरीत छे.
केटलाक पंचमहाव्रतने साधन माने छे, एनाथी निश्चय प्रगटे छे एम माने छे, ते मोक्षनुं परंपरा साधन छे एम माने छे. पण कोने? अने कयां? जेने एकला व्यवहारनी क्रिया छे एने तो मिथ्यात्वभाव छे, मूढतानो भाव छे. मिथ्यात्वमां पडयो छे एने व्यवहार केवो? भाई! रागथी भिन्न पडीने, आत्मा निर्मळानंदस्वरूप प्रभु भगवान छे एवो जेणे अनुभव कर्यो छे तेने निश्चय थयो छे अने तेना सहचर रागने आरोप करीने उपचारथी परंपरा साधन कह्युं छे. साधन नथी एने साधन कहेवुं एनुं नाम व्यवहार छे. भाई! प्रज्ञाछीणी कहो के स्वानुभव कहो, ते एक ज साधन छे. आ तो अंतरनी वातो छे. पंडिताईना अभिमानथी दग्ध कोई सत्यने वींखी नाखे तोपण सत्य तो सत्य ज रहेशे.
वास्तविक साधन निश्चय, प्रगटया विना व्यवहारने साधननो आरोप पण अपातो नथी. व्यवहार साधन छे नहि, तथा निश्चय विना तेने साधननो आरोप पण न अपाय.
अरे! भगवानना विरह पडया! सर्वज्ञ वीतराग हाजर नथी. एटले न्यायमार्गने लोकोए मरडी-मचडी नाख्यो. पण एम न कर, भाई! तने दुःख थशे. सम्यग्दर्शन विना, स्वानुभव विना रागने साधन मानतां तने दुःख थशे, तारुं अहित थशे. भेंसना आंचळमां दूध होय छे तेने जेम बळुकी बाई दोहीने बहार काढे छे तेम, गाथामां कुंदकुंदाचार्यदेवे जे भावो भर्या छे तेने अमृतचंद्रस्वामीए टीका द्वारा दोहीने बहार काढया छे. ए भावोने अहीं प्रवचनमां कहेवामां आवे छे. भाई! राग ते साधन नथी तो शरीर धर्मनुं साधन तो कयांथी थाय? न ज थाय, न ज होय.
प्रश्नः– ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ एम आवे छे ने?
उत्तरः– ए तो व्यवहारनां कथन छे. तेने यथार्थ मानी ले ते तो उपदेशने पण लायक नथी. व्यवहारथी निश्चय पमाय एनो अर्थ शुं? भाई! व्यवहार छे ते निश्चयने बतावे छे. पण व्यवहारथी निश्चय प्राप्त थाय छे एम एनो अर्थ नथी. व्यवहारना लक्षे निश्चयमां जवाय एम छे ज नहि. व्यवहार निश्चयने बतावे छे एम आठमी गाथामां आव्युं छे. भेद अभेदने बतावे छे, पण भेदना लक्षे अभेदमां न जवाय.