समयसार गाथा ७६ ] [ १२प व्यवहार छे ते निश्चयने बतावे छे एटले के व्यवहारनो उपदेश करनार निश्चयमां तेने लई जवा मागे छे; अने श्रोता पण भेद उपर लक्ष न करतां अंदर अभेद, अखंड छे तेनुं लक्ष करे छे-त्यारे तेने व्यवहार ते साधन छे एम उपचारथी आरोप करीने कहेवामां आवे छे.
अहीं कहे छे-ज्ञानी धर्मी-जीव पुद्गलकर्मने एटले रागना भावने जाणवानुं कार्य स्वतंत्रपणे करे छे. आत्मा तेने जाणवानुं कार्य करे छे तोपण प्राप्य, विकार्य, निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्य लक्षणवाळुं परद्रव्यस्वरूप कर्म तेने नहि करता एवा ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव नथी. रागने जाणवा छतां राग ते कर्म अने आत्मा रागनो कर्ता अथवा राग ते कर्ता अने जाणवाना परिणाम थया ते कर्म एवो संबंध ज्ञानीने नथी. भाई! आ परम सत्य छे, अने आ सिवाय बीजी वातो सो टका असत्य छे. आमां कोई छूटछाटने अवकाश नथी. वस्तुनी स्थिति ज आवी छे. ज्ञानी रागने जाणे छतां राग साथे तेने कर्ताकर्मभाव नथी.
‘जीव पुद्गलकर्मने जाणे छे तोपण तेने पुद्गल साथे कर्ताकर्मपणुं नथी.
सामान्यपणे कर्तानुं कर्म त्रण प्रकारनुं कहेवामां आवे छे-निर्वर्त्य, विकार्य अने प्राप्य. कर्ता वडे, जे प्रथम न होय एवुं नवीन कांई उत्पन्न करवामां आवे ते कर्तानुं निर्वर्त्य कर्म छे. कर्ता वडे, पदार्थमां विकार-फेरफार करीने जे कांई करवामां आवे ते कर्तानुं विकार्य कर्म छे. कर्ता, जे नवुं उत्पन्न करतो नथी तेम ज विकार करीने पण करतो नथी, मात्र जेने प्राप्त करे छे ते कर्तानुं प्राप्य कर्म छे.’
अहीं प्रथम निर्वर्त्य कर्म कह्युं छे. टीकामां पहेलां प्राप्य कर्म लीधुं छे. आ कथननी शैली छे. जे राग थाय ते पुद्गलनुं प्राप्य कर्म छे अने ते समये जाणवाना परिणाम जे थाय ते आत्मानुं प्राप्य कर्म छे. पूर्वनी दशा पलटीने ते समये जे राग थयो ते पुद्गलनुं विकार्य कर्म छे अने आत्माना जाणवाना परिणाम पूर्वे जे बीजा हता ते पलटीने ते रागने जाणवाना ज्ञानना परिणाम थया ते आत्मानुं विकार्य कर्म छे. जे राग नवीन उत्पन्न थयो ते पुद्गलनुं निर्वर्त्य कर्म छे अने ते रागने जाणवाना जे नवीन परिणाम थया ते आत्मानुं निर्वर्त्य कर्म छे.
रागना भावने अहीं पुद्गलनुं प्राप्य कर्म कह्युं एटले कोई एम अर्थ करे के-जुओ, निमित्तथी कार्य थयुं ने? तो ते बराबर नथी. अरे भाई! अहीं कई अपेक्षाए वात करी छे? पुद्गल छे ते विकारनुं निमित्त छे. ए विकार अने निमित्त बन्नेय पर चीज छे. ए माटे विकारने परमां नाख्यो छे. भाई! जे विभाव उपजे छे ते शुं स्वभावमां छे? ना; तेथी विभावने परमां नाखी, निमित्तनी मुख्यताथी पुद्गलनुं कर्म कह्युं