१२६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ छे. अने त्रिकाळी ध्रुव स्वभावभाव पोतानो छे एम कह्युं छे. आम बन्नेने (स्वभाव- विभावने) जुदा पाडया छे. हवे कहे छे-‘जीव पुद्गलकर्मने नवीन ऊपजावी शकतो नथी कारण के चेतन जडने केम उपजावी शके? अहीं भाषामां पुद्गलकर्म कह्युं छे, पण एमां राग पण भेगो आवी जाय छे. जीव पुद्गलना कार्यने एटले रागने नवीन ऊपजावी शकतो नथी. केम? तो कहे छे के चेतन जडने केम ऊपजावी शके? अहाहा...! शुद्ध चैतन्यनो पिंड प्रभु आत्मा, राग जे अचेतन छे, पुद्गलना परिणाम छे तेने केम ऊपजावी शके? (न ज ऊपजावी शके) अरे! लोकोने अभ्यास नहि एटले झीणुं लागे छे. केटलाक तो व्यवहारनी रुचिमां मग्न छे. पांच महाव्रत, समिति, गुप्ति पाळे, घरबार छोडयां होय, बायडी-छोकरां छोडयां होय एटले जाणे अमे केटलो त्याग कर्यो एम माने; पण भाई! खरेखर तें शुं छोडयुं छे? रागनी एकता छोडी नहि तो तें शुं छोडयुं? परने छोडवुं ए तो असद्भूत व्यवहारनयनुं कथन छे. ए पण जेने रागनी एकता छूटी छे तेणे परने छोडयां-एम असद्भूत व्यवहारनयथी कहेवाय छे. खरेखर तो आत्मामां परनां ग्रहण-त्याग छे ज नहि. ‘त्याग-उपादान शून्यत्व’ नामनी आत्मामां एक शक्ति एवी छे जेना कारणे परना ग्रहण-त्याग आत्मा त्रणे काळ शून्य छे. रजकणने ग्रहवुं के छोडवुं ए आत्मामां छे ज नहि. रागनी एकता तूटे, स्वरूपना लक्षे रागथी भिन्न पडे त्यारे ‘राग छोडयो’-एम कहेवुं ए पण व्यवहारनयनुं कथन छे. अने रागना निमित्तो छोडया एम कहेवुं ए असद्भूत व्यवहारनयनुं कथन छे. गाथा ३४नी टीकामां आवे छे के-आत्माने परभावना त्यागनुं कर्तापणुं नाममात्र छे. परमार्थे रागना त्यागनो कर्ता आत्मा छे ज नहि. राग एनामां कयां हतो के ते रागने छोडे? राग तो पुद्गलना परिणाम छे. ज्ञाताद्रष्टाना परिणाम प्रगट थया त्यारे राग उत्पन्न थयो नहि एटले रागने छोडयो एम व्यवहारनयथी कथन करवामां आवे छे. आम छे तो पछी परने ग्रहवुं ने छोडवुं ए कयां रह्युं? आटलां द्रव्य खपे, आटलां न खपे; दूध, दहीं इत्यादि रस न खपे ए बधुं परनुं ग्रहण- त्याग आत्मामां कयां छे? परना लक्षे राग थतो हतो ते स्वना लक्षे छूटयो त्यारे आटलो त्याग कर्यो एम व्यवहारथी कहेवामां आवे छे. भाई! कथनमां तो बीजुं शुं आवे? कथनमां तो एम आवे के-व्यवहारव्रत ग्रहण करवां, व्रत पाळवां, अतिचार टाळवा-इत्यादि. पण ए बधुं व्यवहारनयनुं कथन छे एम समजवुं. जीव पुद्गलकर्मने नवीन उपजावी शकतो नथी. आत्मा ज्ञानस्वभावी प्रभु छे. ए रागने उपजावी शकतो नथी, केमके चेतन जडने केम उपजावी शके? छठ्ठी गाथामां आवे छे के आत्मा प्रमत्त पण नथी, अप्रमत्त पण नथी केमके ते शुभाशुभभावना स्वभावे थतो नथी. शुभाशुभ भाव जड छे, अचेतन छे अने भगवान आत्मा शुद्ध