समयसार गाथा ७६ ] [ १२७ चैतन्यमूर्ति छे. जो आत्मा शुभाशुभभावरूपे थाय तो ते जड थई जाय. पण ते कदीय ज्ञायकभावथी जडभावरूप थतो नथी. व्यवहाररत्नत्रयनो भाव अचेतन छे. तेने आत्मा उपजावी शकतो नथी. आवी वात छे.
व्यवहाररत्नत्रयनो भाव जे अचेतन छे ते चैतन्यभावनुं साधन केम थाय? न ज थाय. जे विरुद्ध भाव छे ते साधन न थाय. निश्चयरत्नत्रयनी साथे ए जातना विकल्पनी मर्यादा वर्ते छे. माटे निमित्त अने सहचर देखीने तेने आरोप करीने साधन कह्यो छे. छे तो बंधनुं कारण, छे तो दुःखरूप भाव, पण सहचर देखीने आरोपथी व्यवहाररत्नत्रय नाम आप्युं छे. चार मणनी घउंनी गुणी होय त्यां बारदान भेगुं तोळीने चार मण अढीशेर कहेवाय छे, पण बारदान ए कांई माल नथी. तेम निश्चयरत्नत्रयनी साथे राग होय तेने व्यवहारथी रत्नत्रय कह्यो, पण ए कांई साचां रत्नत्रय नथी. भाई! जेम छे तेम यथार्थ निर्णय करवो पडशे. अहीं कहे छे-‘माटे पुद्गलकर्म जीवनुं निर्वर्त्य कर्म नथी,’ अर्थात् राग छे ते जीवे ऊपजावेलुं कार्य नथी.
हवे कहे छे-‘जीव पुद्गलमां विकार करीने तेने पुद्गलकर्मरूपे परिणमावी शकतो नथी कारण के चेतन जडने केम परिणमावी शके? माटे पुद्गलकर्म जीवनुं विकार्य कर्म पण नथी.’ जे शुभ परिणाम थया ए पुद्गलनुं विकार्य छे, ते जीवनुं विकार्य कर्म नथी.
‘परमार्थे जीव पुद्गलने ग्रहण करी शकतो नथी कारण के अमूर्तिक पदार्थ मूर्तिकने कई रीते ग्रहण करी शके? माटे पुद्गलकर्म जीवनुं प्राप्य कर्म पण नथी.’ पुद्गलनी वात करी छे तेमां राग पण आवी जाय छे. पहेलुं निर्वर्त्य लीधुं, पछी विकार्य लीधुं अने पछी प्राप्य कर्म कह्युं.
‘आ रीते पुद्गलकर्म जीवनुं कर्म नथी अने जीव तेनो कर्ता नथी. जीवनो स्वभाव ज्ञाता होवाथी ज्ञानरूपे परिणमतो पोते पुद्गलकर्मने जाणे छे.’ ज्ञाता विकास पामे तो ज्ञानना परिणामे-भावे विकास पामे. परंतु ज्ञानस्वरूपी आत्मा रागरूपे केम थाय? पोते ज्ञाता होवाथी ज्ञानरूपे परिणमतो पुद्गलकर्मने जाणे छे, जे रागनी क्रिया थाय तेने पोतामां रहीने पोताथी जाणे छे. एने जाणे छे ए व्यवहार थयो, निश्चयथी तो पोताने अनुभवे छे- जाणे छे.
भाई! आ भव अनंत भवना अभाव माटे छे. जेने जन्म-मरणथी छूटवुं छे तेणे पोताना हितनी आ वात समजवी पडशे.
हवे कहे छे-‘माटे पुद्गलकर्मने जाणता एवा जीवनो परनी साथे कर्ताकर्मभाव केम होई शके? न ज होई शके.’ ल्यो ७६ पूरी थई.