समयसार गाथा ७७ ] [ १२९
हवे पूछे छे के पोताना परिणामने जाणता एवा जीवने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? गाथा ७६मां एम हतुं के रागने जाणता एवा जीवने राग साथे कर्ताकर्मभाव नथी. अहीं एम प्रश्न छे के पोताना परिणामने जाणता एवा जीवने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? केटली स्पष्टता करी छे! अहो! कोई धन्य घडीए समयसार रचाई गयुं छे. जगतनां सद्भाग्य के आवी चीज रही गई. अहा! एणे तो केवळीना विरह भूलाव्या छे. अहीं पूछे छे के पोताना परिणामने जाणवानुं कर्म करे छे एवा जीवने राग साथे, पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव छे के नहि? पोताना परिणामने जाणवानुं कर्म तो करे छे तो भेगुं परनुं कार्य पण करे छे के नहि?
लोकोमां कहेवाय छे ने के एक गायनो गोवाळ ते पांच गायोनो गोवाळ. एक गायने चारवा लई जाय तो भेगी पांचने चारवा लई जाय एमां शुं? एम आत्मा पोताना परिणामने जाणवानुं कर्म करे छे तो भेगुं परनुं रागरूपी कर्म करे छे के नहि? तेने राग साथे कर्ताकर्म संबंध छे के नहि? शिष्यना आ प्रश्ननो उत्तर कहे छेः-
जुओ, वस्तुनी स्थितिनुं आ वर्णन छे. धर्मीने शुं होय छे अने अज्ञानीने शुं होय छे एनी आ वात छे. धर्मीने आत्मानी-शुद्ध चैतन्यनी द्रष्टि होय छे. तेना ज्ञाननुं स्वपरप्रकाशक सामर्थ्य होवाथी ज्ञानभावे परिणमतो ज्ञानी स्व-परने जेम छे तेम जाणे छे एनी अहीं वात छे. कहे छे-
‘प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं, व्याप्यलक्षणवाळुं आत्माना परिणामस्वरूप जे कर्म, तेनामां आत्मा पोते अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतो, ते-रूपे परिणमतो अने ते-रूपे ऊपजतो थको, ते आत्मपरिणामने करे छे.’
ज्ञानना जे परिणाम (ज्ञानीने) थया ते, ते काळे प्राप्त थाय छे. ध्रुव छे एटले के ते काळे ते ज थवाना छे एम निश्चित छे. आ प्राप्य कर्मनी व्याख्या छे. आत्माना जाणवाना जे परिणाम थया ते ते काळे ते ज थवाना हता ते थया तेने प्राप्य एटले ध्रुव कहेवाय छे. आत्मा तेने पहोंची वळे छे. जाणवाना, देखवाना, श्रद्धवाना, जे परिणाम छे ते आत्मानुं प्राप्य कर्म छे. एटले के ते काळे ते (परिणाम) ध्रुव छे. ते काळे ते ज थवाना हता जे थया छे अने तेने आत्मा मेळवे छे, पहोंचे छे, प्राप्त करे छे. वळी ए ज परिणामने विकार्य कर्म कहे छे. प्रथम जे हता ते पलटीने आ थया माटे तेने विकार्य कर्म कहे छे. अने ते समये नवा ऊपज्या तेथी तेने निर्वर्त्य कर्म कहे छे.