Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१३० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ एना ए ज परिणामने निर्वर्त्य कर्म कहे छे. आवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं (ज्ञान-श्रद्धानरूप) कर्म तेमां आत्मा पोते अंतर्व्यापक थईने ते परिणामने करे छे.

द्रव्यनी निर्मळ पर्याय ते एनुं व्याप्यलक्षणवाळुं कार्य छे. ते वखते ए ज कार्य थवानुं छे एवुं जे आत्माना परिणामस्वरूप कर्म एटले के ज्ञाता-द्रष्टाना परिणाम स्वरूप- सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना परिणामस्वरूप कर्म, तेमां आत्मा पोते अंतर्व्यापक थईने, आदि- मध्य-अंतमां व्यापे छे. जुओ, द्रव्यद्रष्टिवंतने ज्ञाता-द्रष्टाना जे निर्मळ परिणाम थया तेनी आदिमां आत्मा छे, मध्यमां आत्मा छे अने अंतमां पण आत्मा छे. ते रागने जाणे छे माटे तेनी आदिमां राग छे एम नथी. राग छे माटे जाणवाना परिणाम थया एम रागनी अपेक्षा नथी. पोताना आत्मपरिणामने ग्रहतां-जाणतां आत्माने राग साथे कर्ताकर्मपणुं छे एम नथी. पोते स्वयं अंतर्व्यापक थईने पोताना जाणवाना परिणामने आत्मा करे छे. संस्कृत पाठमां ‘स्वयं’ शब्द पडयो छे. आत्मा स्वयं पोताना आत्म-परिणामने करे छे.

प्रश्नः– आत्मा कांई करतो नथी ने?

उत्तरः– हा, पण ए वात अत्यारे अहीं नथी लेवी. अहीं तो अत्यारे परथी अने रागथी भिन्न पाडवुं छे अने स्वथी (निर्मळ पर्यायथी) अभिन्न सिद्ध करवुं छे. द्रव्य अने तेनी निर्मळ पर्यायने अहीं अभेद बताववी छे. कह्युं ने के आत्मा स्वयं अंतर्व्यापक थईने पोताना आत्मपरिणामने करे छे. अहा! जे निर्मळ पर्याय थई ते आत्मानुं कर्तव्य छे. पोताना ज्ञाता- द्रष्टाना जे निर्मळ परिणाम थया तेनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा पोते व्यापे छे. ते निर्मळ परिणाम आत्मा स्वयं करे छे एम अहीं सिद्ध करवुं छे. माटे स्वभावना आश्रये जे वीतरागी पर्याय थई ते परिणामने ग्रहतो एटले के प्राप्त करतो अने ते-रूपे परिणमतो अने ऊपजतो ते आत्मपरिणामने आत्मा करे छे.

आ मूळ वात छे अने छे घणी ऊंची. कहे छे के जेनुं लक्ष त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य उपर छे एने जे परिणाम थया ते परिणामनी आदिमां भगवान आत्मा छे. ते परिणामने आत्मा ग्रहे छे. धर्मनी जेने दशा थई छे एने शुभभाव आवे, पण तेने जाणवानुं काम आत्मा करे छे. ते पण शुभभाव छे माटे जाणे छे एम नथी. स्वपरप्रकाशक एवा ज्ञानना परिणमननी आदिमां आत्मा पोते ज छे. परने जाणे छे माटे त्यां परनी अपेक्षा छे एम नथी. अहाहा...! दुनिया साथे मेळ न खाय एवी आ गजब वात छे! (दुनिया साथे मेळ छे ते तोडे तो समजाय एवी छे.)

आ वाणी (जिनवाणी) सांभळे छे ए शुं शुभभाव नथी? ए शुभभाव छे. अशुभथी बचवा ए शुभभाव आवे छे. अहीं कहे छे के शुभभावना काळे आत्मा (ज्ञानी)