१३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ चारित्र प्रगटे छे एम नथी. चारित्र तो आत्मानो गुण छे, वीतरागी शक्ति छे. एनो आश्रय लईने विशेष एकाग्र थाय त्यारे तेने चारित्रदशा प्रगट थाय छे. एवा चारित्रवंतने ते काळमां पंचमहाव्रतादिना परिणाम होय छे अने तेने व्यवहार कहेवामां आवे छे. अज्ञानीने व्यवहार केवो? समयसार गाथा ४१३मां त्रण बोल कह्या छे-तेओ (अज्ञानीओ) अनादिरूढ, व्यवहारमूढ, निश्चय पर अनारूढ वर्तता थका भगवान समयसारने देखता- अनुभवता नथी एम कह्युं छे. जेने आत्मदर्शन थयुं नथी अने बाह्य व्यवहारने पाळे छे तेने अनादिरूढ व्यवहारमूढ कह्यो छे. जाणनार जाग्यो नथी तेने व्यवहार केवो? आ वस्तुस्थिति छे.
अहीं कहे छे के-ज्ञानी पोताना परिणामने जाणे छे तोपण प्राप्य, विकार्य अने निर्वत्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म तेने नहि करता एवा ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मपणुं नथी. केटली स्पष्टता छे!
गाथा ७६ मां कह्युं हतुं ते अनुसार अहीं पण भावार्थ जाणवो. त्यां गाथा ७६ मां ‘पुद्गलकर्मने जाणतो ज्ञानी’ एम हतुं एने बदले अहीं ‘पोताना परिणामने जाणतो ज्ञानी’ एम कह्युं छे. बस आटलो फेर छे. ल्यो, गाथा ७७ पूरी थई.