Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७७ ] [ १३३ प्रश्नः– सविकल्पद्वारथी निर्विकल्पतानी वात पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए रहस्यपूर्ण चिट्ठीमां करी छे ने? उत्तरः– भाई! एनो अर्थ एवो छे के आवो विकल्प हतो तेने छोडीने निर्विकल्पता थाय छे, -आवुं त्यां ज्ञान कराव्युं छे. परंतु आवा विकल्प आवे माटे एनाथी निर्विकल्पदशा थाय एम अर्थ नथी. ए तरफनुं लक्ष छोडे त्यारे निर्विकल्पता थाय छे. लोकोने शुभभाव छोडवानुं आकरुं पडे छे; पण शुं थाय? शुभभाव तो जे निगोदमां जीवो पडया छे तेमने पण निरंतर थाय छे. क्षणे शुभ, क्षणे अशुभ-एम शुभाशुभनी निरंतर धारा वहे छे. एक शरीरमां निगोदना जे अनंत जीव छे तेमने क्षणेक्षणे शुभाशुभ थया ज करे छे. ए कांई नवीन नथी.

प्रश्नः– प्रवचनसारनी गाथा २४पमां शुभोपयोगी पण श्रमण छे एम कह्युं छे ने?

उत्तरः– ए तो धर्मपरिणत मुनिनी वात करी छे. शुद्धोपयोगी निरास्रव छे अने शुभोपयोग होय त्यां सुधी सास्रव छे. धर्मपरिणत मुनि त्रण कषायना अभाववाळो छे त्यारे तो तेने मुनि कह्यो छे. तेने शुभोपयोग होय छतां श्रमण कहेवामां आव्यो छे. पण एकला शुभभाववाळा मुनिनी त्यां वात नथी. एवा शुभभाव तो अज्ञानीए अनंतवार कर्या छे. शुभभाव हो, पण ए कांई धर्म छे के धर्मनुं कारण छे एम नथी. होय छे ए जाणवा माटे छे. बापु! आवुं वीतरागनुं कहेलुं शुद्ध तत्त्व पकडे नहि एने धर्म केम थाय?

हवे कहे छे-‘माटे, जो के ज्ञानी पोताना परिणामने जाणे छे तोपण, प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म, तेने नहि करता एवा ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव नथी.’ ज्ञानी पोताना परिणामने जाणे छे, जाणवानुं काम करे छे. करे छे माटे भेगुं रागनुं कार्य पण ते करे छे एम नथी एम कहे छे. ज्ञानी पोताना परिणाम एटले सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्ररूप शुद्ध रत्नत्रयना मोक्षमार्गना परिणामने करे छे तोपण प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं पर द्रव्य परिणामस्वरूप कर्म तेने ते करतो नथी. तेथी तेने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव नथी. जुओ, बे ज भाग पाडया छे. एककोर स्वभाव, बीजी कोर विभाव. भाई! भेदज्ञान करवानी आ वात छे. विभावनी साथे जीवने एकताबुद्धि छे ए ज महा मिथ्यात्वनी गांठ छे. विभावमां तादात्म्यनो अभ्यास छे ए ज मिथ्यात्व छे. ए विभाव अने शुद्ध चैतन्यस्वभावनी भिन्नता करवी ए वस्तुना स्वभावरूप सम्यग्दर्शन छे.

भाई! नवमी ग्रैवेयक जाय एवा शुभभाव अनंतवार कर्या, छतां एने धर्म थयो नहि. अने एनाथी कोईने धर्म थयो पण नथी. वस्त्र छोडयां माटे मुनिपणुं आवी गयुं एम नथी. स्वमां उग्र आश्रय थाय त्यारे चारित्र प्रगटे छे. परंतु व्यवहारनी क्रिया पाळे छे माटे