१३२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ छे के नहि? तो कहे छे के एम नथी. ‘वस्तु सहावो धम्मो’-वस्तुनो स्वभाव धर्म छे. आत्मा वस्तु छे-तेनो स्वभाव ज्ञान, दर्शन, आनंद छे. ज्यां स्वभावनी द्रष्टि थई त्यां सम्यग्दर्शन-ज्ञान- चारित्ररूप निर्मळ परिणाम थया. ते निर्मळ परिणामने ज्ञानी करतो होवा छतां, अने तेने जाणतो होवा छतां, परनी साथे तेने कर्ताकर्मभाव नथी एम कहे छे.
माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने घडाने करे छे. घडो थवानी आदि-मध्य-अंतमां माटी छे. कुंभारनो हाथ अडयो माटे कुंभार घडो थवानी आदिमां छे एम नथी. कुंभार प्रसरीने घडो थतो नथी. घडारूप कार्यमां कुंभार प्रसरतो नथी, पण माटी पोते घडामां प्रसरीने-व्यापीने घडाने करे छे, घडाने ग्रहे छे. घडो ते माटीनुं प्राप्य छे. ते समयनुं ते ध्रुव प्राप्य छे. विकार्य छे ते व्यय अने निर्वर्त्य छे ते उत्पाद छे ते वखते जे पर्याय थवानी हती ते थई माटे तेने ध्रुव कही छे. छे तो पर्याय, पण निश्चित छे तेथी ध्रुव कही छे. अहीं एक समयनी पर्यायमां उत्पाद-व्यय-ध्रुव कह्या छे. अहो! आचार्यनी अजब शैली छे! कहे छे के माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने घडाने ग्रहे छे. घडानी पर्याय ते माटीनुं ते समयनुं ध्रुव छे, प्राप्य छे. अहाहा...! ते समयनी पर्याय ते ज थवानी छे. जुओ ने! बधुं क्रमबद्ध छे एम अहीं सिद्ध करे छे. कुंभार घडाने करे छे ए वात ज नथी.
जेम माटी घडामां अंतर्व्यापक थईने घडाने ग्रहे छे, घडारूपे परिणमे छे, घडारूपे उपजे छे तेम आत्मा पूर्णानंदनो नाथ प्रभु बाह्यस्थित एवा परद्रव्यनां परिणाममां एटले के व्यवहाररत्नत्रयना शुभरागमां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी, ते-रूप ऊपजतो नथी. शुभरागनी आदिमां आत्मा नथी, मध्यमां आत्मा नथी, अंतमां आत्मा नथी. रागनी आदि-मध्य-अंतमां पुद्गल छे. धर्मी जीव जेम वीतरागी शुद्ध रत्नत्रयना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने, तेना आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने ते निर्मळ परिणामने ग्रहे छे तेम व्यवहारना शुभरागने तेना आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने ग्रहतो नथी. राग छे ए तो पुद्गलनुं प्राप्य कर्म छे. पुद्गल तेने ग्रहे छे, पुद्गल ते-रूपे परिणमे छे; पुद्गल ते-रूपे ऊपजे छे.
भाई! ध्यान राखे तो आ समजाय एवुं छे. आ तो सत्ना शरणे जवानी वात छे. दुनिया न माने तेथी शुं? सत् तो त्रिकाळ सत् ज रहेशे. आत्मा अनंत शक्तिनुं धाम चैतन्यस्वभावी भगवान छे. ए त्रिकाळी ध्रुव प्रभुने ग्रहतां, एनो आश्रय लेतां जे शक्तिरूपे छे ते व्यक्तिरूपे प्रगट थयो. त्यां जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना निर्मळ परिणाम थया तेनी आदि-मध्य-अंतमां आत्मा छे. परंतु रागना आदि-मध्य-अंतमां आत्मा नथी. तेथी आत्मा रागपरिणामने करतो नथी. व्यवहार रत्नत्रयनो शुभराग जे बाह्यस्थित परद्रव्यना परिणाम छे तेने आत्मा ग्रहतो नथी. तेथी ज्ञानी-धर्मी ते शुभरागनो कर्ता नथी.