१३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ समयसार गाथा ७८ः मथाळुं
हवे पूछे छे के पुद्गलकर्मना फळने जाणता एवा जीवने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? ७६मी गाथामां पुद्गलकर्म एटले रागने जाणता ज्ञानीनी वात करी हती. अहीं पुद्गलकर्मनुं फळ जे हरख-शोकना भाव तेने जाणता ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ता-कर्मभाव छे के नथी?-ते वात करे छे. जुओ, हरखशोकना भाव ए पुद्गलकर्मनुं फळ छे अने अतीन्द्रिय आनंद ए आत्मानुं फळ छे.
प्रवचनसारमां आवे छे के शुद्धोपयोगरूप कर्मनुं फळ आनंद छे. त्यां शुद्धोपयोगने कर्म कह्युं छे. आत्माना परिणाम शुद्धोपयोग छे, निर्मळ श्रद्धा-ज्ञान-चारित्र छे. तेनुं कर्मफळ आनंद छे. अहीं रागद्वेषना परिणाम ते पुद्गलकर्म छे. एनुं फळ हरख, शोक, दुःख छे. अरे! भगवानना आ भरतमां विरह पडया! समोसरणस्तुतिमां आवे छे के-रे! रे! सीमंधर जिनना विरहा पडया आ भरतमां’ -अने आ बधो गोटो ऊठयो. शिष्य पूछे छे के पुद्गलकर्म जे शुभाशुभ राग छे एनुं फळ जे सुख-दुःख, हरख-शोक तेने जाणता ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? हरख-शोकना भाव थाय एने जाणे छे एटलो संबंध तो छे, तो एने भोगवे छे के नहि? एनी साथे कर्ताकर्मनो संबंध छे के नहि? आ प्रश्ननो उत्तर गाथामां कहे छे-
जुओ, ‘परदव्वपज्जाए’–परद्रव्यपर्याय शब्द पाठमां पडयो छे. ७६, ७७ अने ७८ त्रणे गाथामां आ शब्द पडयो छे. एटले के दया, दान आदि विकल्पो अने हरख-शोकना परिणाम ए बधा परद्रव्यनी पर्यायरूप परिणाम छे एम अहीं कहे छे. ‘प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं, व्याप्यलक्षणवाळुं सुखदुःखादिरूप पुद्गलकर्म- फळस्वरूप जे कर्म, तेनामां पुद्गलद्रव्य पोते अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतुं, ते-रूपे परिणमतुं अने ते-रूपे ऊपजतुं थकुं, ते सुखदुःखादिरूप पुद्गल कर्मफळने करे छे.’ शुं कहे छे? जे हरख-शोकना परिणाम थाय छे ते पुद्गलनुं प्राप्य एटले ध्रुव छे. ध्रुव छे एटले जे परिणाम थवाना छे ते ज थया छे; अने तेने पुद्गल प्राप्त करे छे, आत्मा प्राप्त करतो नथी. जुओ, अहीं द्रव्यद्रष्टि अने स्वभावनी अपेक्षाथी आ वात छे. ज्यारे ज्ञानप्रधान शैली होय त्यारे ए सुख-दुःखना परिणामनुं भोक्तापणुं जीवने छे, तथा राग-द्वेष, सुख-दुःखनी अवस्था जीवनी छे एम कथन आवे. जीव पोते ते-रूपे परिणमे छे अने तेनुं कर्तापणुं जीवने छे एम ज्ञाननय जाणे छे. त्रिकाळी स्वभावनी अपेक्षाए विकारी परिणाम जीवना नथी. परंतु पर्यायनुं ज्ञान करवानी अपेक्षाथी विकारी