समयसार गाथा ७८ ] [ १३७ परिणाम जीवनी पर्यायमां पोताथी थया छे. आम ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय त्यां ते प्रमाणे समजवुं जोईए.
प्राप्य एटले ध्रुव-एटले के हरख-शोकना परिणाम ते समये जे थवाना छे ते ज थया छे-ते प्राप्य, विकार्य एटले परिणमतुं अने निर्वर्त्य एटले ऊपजतुं, एवुं व्याप्यलक्षणवाळुं सुख-दुःख, हरख-शोक, रति-अरति आदि जे परिणाम छे ते पुद्गलकर्मफळस्वरूप छे एम कहे छे. भगवान आत्मानो पाक तो आनंदस्वरूप छे. एनुं फळ तो आनंद छे. नित्यानंदस्वरूप प्रभु आत्मा-एनुं शुद्धोपयोगरूप जे कर्म तेनुं फळ आनंद छे. पर्यायमां अतीन्द्रिय आनंदनुं फळ आवे ते आत्माना परिणाम छे. अने सुखदुःखना जे विभाव परिणाम छे ते आत्माना परिणाम नहि, ए तो पुद्गलना परिणाम छे. हरख-शोक आदिना परिणाम पुद्गलकर्मफळस्वरूप छे.
प्रश्नः– आप विकारी परिणामने पुद्गलना परिणाम केम कहो छो?
उत्तरः– भाई! विकार छे ते वस्तुना स्वरूपमां नथी. वस्तुमां एटले आत्मामां एवो कोई गुण के शक्ति नथी जे विकारने करे. तेथी तेने पर गणीने पुद्गलना परिणाम कहीने भिन्न पाडी नाख्या, अने चैतन्यस्वरूप आत्माने तेनाथी भिन्न करी नाख्यो छे. चैतन्यस्वरूपने द्रव्य-गुण-पर्यायथी भिन्न पाडी विकारथी भेदज्ञान कराव्युं छे. चैतन्यना द्रव्य-गुणथी तो विकार भिन्न छे ज, परंतु पर्यायथी पण विकारने भिन्न पाडवा तेने पुद्गलना परिणाम कह्या छे. एकांत छोडीने जे अपेक्षा होय ते अपेक्षाथी यथार्थ समजवुं जोईए.
पुद्गलकर्मफळ जे कर्तानुं कार्य थयुं तेनामां पुद्गलद्रव्य अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य- अंतमां व्यापीने ते हरख-शोकरूप पुद्गलकर्मफळने करे छे. हरख-शोकना भाव करे एवी आत्मामां कोई शक्ति नथी. आनंदनो नाथ एवो भगवान आत्मा हरख-शोक आदिरूपे केम परिणमे? ए तो आनंदरूपे परिणमे एवो तेनो स्वभाव छे. धर्म पण आनंदरूप ज छे. ए आनंदना परिणाम ते जीवनुं प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्यरूप कर्म छे अने हरख-शोक आदि विकारना परिणाम पुद्गलनुं कर्म छे. कहे छे के हरख-शोक आदि भावमां पुद्गलद्रव्य अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने करे छे. हरख-शोकनी पर्यायमां, जीवनी नबळाई हती माटे ए भाव थयो एम नहीं. जीवनी नबळाईथी विपरीतपणे परिणम्यो माटे हरखशोक थवामां जीवनो कांईक अंश छे ए वात अहीं नथी. स्वभावमां विभाव छे ज नहि पछी एनो अंश कय ांथी आव्यो? मध्यस्थ थईने पोतानो पक्ष छोडीने समजे तो आ समजाय एवुं छे.
अहो! आचार्य भगवंतोए कमाल काम कर्यां छे. दिगंबर आचार्यो धर्मना स्थंभ हता. तेओए धर्मनी स्थिति यथावत् ऊभी राखी छे. अहीं कहे छे के पुण्य-