१३८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ पापना भावनुं फळ जे हरखशोकना परिणाम ए पुद्गलनुं कार्य छे, जीवनुं नहि; स्वद्रव्यस्वरूप भगवान आत्मानुं ए कार्य नहि. पुद्गल तेमां आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहे छे, पहोंचे छे. ते काळनुं ते पुद्गलनुं व्याप्य छे, आत्मानुं नहि. पुद्गलकर्म ते-रूपे परिणमतुं, ते-रूपे ऊपजतुं थकुं ते सुखदुःखादि पुद्गलकर्मफळने करे छे.
हवे कहे छे-‘आम पुद्गलद्रव्य वडे करवामां आवतुं जे सुखदुःखादिरूप पुद्गलकर्मफळ तेने ज्ञानी जाणतो होवा छतां, जेम माटी पोते घडामां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, घडाने ग्रहे छे, घडारूपे परिणमे छे अने घडारूपे ऊपजे छे तेम, ज्ञानी पोते बाह्यस्थित एवा परद्रव्यना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने, तेने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी अने ते-रूपे ऊपजतो नथी.’
जुओ, पुद्गलकर्मफळने ज्ञानी जाणे छे ए व्यवहार कह्यो. ते संबंधीनुं ज्ञान थाय छे तेथी कर्मफळने जाणे छे एम कह्युं. खरेखर तो ज्ञानी पोताने जाणे छे. जेवी सुखदुःखनी कल्पना थई एवुं ज ज्ञान अहीं जाणे छे तेथी एनुं ज्ञान छे एम कह्युं पण ज्ञान तो आत्मानुं छे. जेवो हरखशोकनो भाव थाय तेवुं ते प्रकारनुं अहीं ज्ञान थाय छे. तेथी कह्युं के ज्ञानी पुद्गलकर्मफळने जाणतो, जेम माटी घडामां अंतर्व्यापक थईने घडाने ग्रहे छे तेम, ज्ञानी पोते बाह्यस्थित एवा परद्रव्यना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने तेने ग्रहतो नथी. हरखशोकना परिणामने धर्मी जीव ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी, ते-रूपे ऊपजतो नथी. पुद्गलकर्मना उदयमां लक्ष जतां जे सुखदुःखना परिणाम थाय ए पुद्गलना परिणाम छे; भगवान आत्माना ए भाव छे ज नहि. अहीं तो ज्ञानीनी व्याख्या छे ने? धर्मी जीवनी द्रष्टि त्रिकाळी स्वभाव उपर होवाथी, निर्विकारी दशा एनुं प्राप्य, विकार्य, निर्वर्त्य कर्म छे, पण विकार एनुं कर्म नथी. ज्ञानी विकारनो कर्ता नथी.
अहाहा...! माटी घडामां व्यापीने घडाने ग्रहे छे, कुंभार नहि. घडानी आदिमां माटी छे, कुंभार तेनी आदिमां नथी. माटी घडामां अंतर्व्यापक थईने, आदि-मध्य-अंतमां प्रसरीने घडाने ग्रहे छे, पण कुंभार घडामां प्रसरे छे एम नथी. घडानी पर्याय ते माटीनुं प्राप्य छे, ध्रुव छे. ते काळे घडानी पर्याय ध्रुव छे एटले चोक्कस छे अने माटी तेने ग्रहे छे. पूर्वनी पर्याय जे पिंडरूप हती तेनो व्यय थईने घडानी पर्याय थई ते माटीनुं विकार्य छे, कुंभारनुं नहि. कुंभारनी पर्यायमां कुंभार होय. कुंभार पोतानी पर्यायमां व्यापीने पोतानी पर्यायनो कर्ता थाय, पण घडानो नहि. परनी पर्यायमां कुंभारनुं व्याप्यव्यापकपणुं कयां छे? (नथी ज)
तेम ज्ञानी पोते बाह्यस्थित एवा परद्रव्यना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने, आदि- मध्य-अंतमां व्यापीने तेने ग्रहतो नथी. निर्मळ ज्ञान अने आनंद ए