Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७८ ] [ १३९ भगवान आत्मानी पर्याय छे अने सुख-दुःखना परिणाम ए तो बाह्यस्थित एवा परद्रव्यनी पर्याय छे. एने ज्ञानी जाणतो होवा छतां तेमां पोते अंतर्व्यापक थईने, प्रसरीने ग्रहतो नथी, ते-रूपे परिणमतो नथी, ऊपजतो नथी; केमके भगवान आत्मा पोते ज्ञाता-द्रष्टाना भावस्वरूप छे. बहु झीणी वात, भाई!

आवी सूक्ष्म वात पकडाय नहि एटले शुभभाव करो, शुभभावथी धर्म थशे एम केटलाक माने छे. पण भाई! एवो आ मार्ग नथी. शुभभाव ए आत्मानुं कर्तव्य नथी. ए धर्म नथी, एनाथी धर्म नथी अने ए धर्मनुं कारण पण नथी. आ वात सांभळीने केटलाक कहे छे के आमां कांईक सुधारो करो. अरे भाई! शुं सुधारो करवो? शुभभाव जे कर्मनुं प्राप्य छे, पुद्गलना परिणाम छे तेनाथी जीवना परिणामने लाभ थाय एम केम बने? जे पुद्गलनुं कार्य छे एनाथी आत्माने सम्यग्दर्शननुं कार्य थाय एम कदीय बनी शके खरुं? एम कदीय न बने. केमके सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना वीतरागी परिणाममां तेना आदि-मध्य-अंतमां भगवान आत्मा अंतर्व्यापक थईने तेने ग्रहे छे. ए निर्मळ परिणाम जीवनुं प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य कर्म छे, पुद्गलनुं नहि. निर्मळ परिणामनी आदिमां आत्मा छे, तेनी आदिमां शुभभाव नथी.

शुभभाव तो पूर्वे अनंतवार थया छे. शुभभावनी शुं वात करवी? नवमी ग्रैवेयक जाय एवा शुभभाव पण अनंतवार थया छे. छतां एवो शुभभाव पण धर्मनुं कारण थयो नहि. भाई! धर्मनी वीतरागी पर्याय थाय एनुं कारण तो पोते शुद्ध त्रिकाळी द्रव्य छे. तेना कारण तरीके शुभभावने मानवो ए तो मोटी हिंसा छे. अहीं स्पष्ट कहे छे ने के ज्ञानी पोते बाह्यस्थित एवा परद्रव्यना परिणाममां, हरख-शोकना परिणाममां अंतर्व्यापक थईने तेने ग्रहतो नथी; तेने जाणे छे, ए पण पोतामां रहीने ते काळे जे परिणाम (ज्ञानना) थवाना छे ते प्राप्यने जाणे छे. जेम राग-द्वेषना, सुख दुःखना भाव ते काळे जे ध्रुवपणे-निश्चितपणे जे थवाना छे तेने पुद्गल प्राप्त करे छे तेम भगवान आत्मा ते ज काळे स्व अने परने जाणे एवा जे प्राप्य-ध्रुव छे ते ज ज्ञानपरिणामने प्राप्त करतो, ते-रूपे परिणमतो अने ते-रूपे ऊपजतो पोताना कर्मने-वीतरागी परिणामने करे छे. अरे! जन्म-मरणथी छूटवानो पंथ तो आ छे, भाई! न समजाय अने कठण पडे एटले शुं मार्ग बदलाई जाय? कदी न बदलाय. हरखशोक, सुख-दुःख आदि विकारी दशा ते पुद्गलकर्मनुं फळ छे, ते आत्मानुं फळ नथी.

प्रश्नः– तो शुं ज्ञानीने पर्यायमां दुःख छे ज नहि?

उत्तरः– भाई! एम समजवुं यथार्थ नथी. अहीं तो वस्तु अने तेना स्वभावनी अपेक्षाए वात छे. द्रष्टि अने द्रष्टिना विषयनी अपेक्षाए आ वात छे. पण ते वखते जे ज्ञान थाय छे ते ज्ञान तो त्रिकाळीने पण जाणे छे अने वर्तमान जे दुःखनी परिणति