१४० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ छे तेने पण जाणे छे के मारामां मने आ दुःखनी परिणति छे; तेने भोगवे पण छे. आ स्याद्वाद वचन छे. रागने भोगवे छे एवो भोक्ता नय छे अने रागने करे छे ए कर्तानय छे. रंगरेज जेम रंगने करे छे तेम भगवान आत्मा जेटलो रागरूपे परिणमे छे तेटलो ए रागनो कर्ता छे. राग करवा लायक छे एम नहि, पण परिणमे छे माटे कर्ता कहेवामां आवे छे. जुओ तो खरा संतोनी आत्मलीला! जाणे अने वेदे-ज्ञानप्रधान कथनमां एम वात आवे, अने द्रष्टि अने द्रष्टिना विषयनी प्रधानताथी एम कहे के रागनुं परिणाम ते पुद्गलनुं कार्य छे, जीवनुं नहि; केमके द्रष्टि छे ते पूर्णानंदनो नाथ प्रभु शुद्ध चैतन्यघन जे आत्मा छे तेने पकडे छे. एटले एनी परिणति निर्मळ ज थाय.
ज्ञानी, जे अशुद्ध परिणाम थया तेने पोतामां रहीने जाणे पण तेने पकडे नहि, ग्रहे नहि, वेदे नहि. गजब वात करी छे ने! अहाहा...! द्रष्टि पूर्णानंदना नाथने पकडे एटले एना परिणमनमां विकार अने सुखदुःख होई शके नहि. आ अपेक्षाए विकारी परिणामनुं कर्म अने हरखशोकनुं कार्य पुद्गलमां नाखी एने जाणनार राख्यो छे. पण तेथी सर्वथा एम न मानी लेवुं के ज्ञानीने सुखदुःख छे ज नहि. जुओ, टीकाकार आचार्य अमृतचंद्रस्वामी स्वयं त्रीजा कळशमां कहे छे के मारी परिणति हजु (संज्वलन) रागादिनी व्याप्ति वडे कलुषित छे. हजु पर्यायमां कलुषित भाव छे पण आ टीकाना काळमां मारी द्रष्टिनुं जोर निर्मळ चैतन्यस्वभाव पर छे तेथी मने अवश्य परम विशुद्धि थशे. अहो! आचार्यनी कोई गजब गंभीर शैली छे!
पंचास्तिकायमां तो आचार्यदेवे एम सिद्ध कर्युं छे के एनी परिणतिमां जे विकार छे एनुं ज (पर्यायनुं) कर्तव्य छे, पर्यायनुं स्वतंत्र कार्य छे. जेटले दरज्जे राग थाय छे तेटले दरज्जे राग एनो कर्ता, राग एनुं कर्म, रागनुं साधन पण राग पोते, रागनो आधार पण राग इत्यादि. द्रव्य-गुण एनुं कारण नथी. त्यां पर्यायनुं अस्तित्व सिद्ध करवुं छे ने. तेथी कहे छे के सुखदुःखना परिणाम स्वयं षट्कारकरूपे परिणमीने पोताथी स्वतंत्र थाय छे. परंतु अहीं द्रव्यद्रष्टिनी मुख्यताथी वात छे. पर्यायद्रष्टि गई अने द्रव्यद्रष्टि थई त्यारे त्यारे सुख-दुःखना परिणमननुं वेदन ज्ञानीने नथी. वळी ए ज वखते साथे रहेलुं ज्ञान एम जाणे छे के जेटलुं सुखदुःखनुं परिणमन छे एटलुं मारुं कर्तृत्व अने भोक्तृत्व छे. अहा! आवी ज्ञानीनी अजब लीला छे!
अरे प्रभु! तुं कयां छो? तो कहे छे के हुं तो मारा जाणवाना परिणमनमां छुं. जेटलुं रागनुं परिणमन थाय ते पुद्गलनुं छे. हुं तो एनो जाणनार छुं. तथा पर्यायने जोउं छुं तो राग अने सुखदुःखनुं जेटलुं कर्तृत्व अने वेदन छे ते मारामां छे एम जाणुं छुं. आम बंने अपेक्षानुं ज्ञान यथार्थ होय छे.
द्रष्टि अने द्रष्टिना विषयमां तो विकारी परिणमननुं कर्तव्य अने वेदन छे ज नहि. भगवान आत्मा अनंतगुणनो पिंड छे. एमां विकारने करे एवो कयो गुण छे? एकेय