समयसार गाथा ७८ ] [ १४१ नहि. ए अपेक्षाए गुणीने पकडतां भगवान आत्मामां रागनुं कर्तव्य अने सुखदुःखनुं वेदन नथी. द्रष्टिनो विषय तो एकलो अभेद छे. द्रष्टिना विषयमां भेद अने पर्याय नथी. द्रष्टि पोते निर्विकल्प छे अने तेनो विषय पण अभेद निर्विकल्प छे. एना विषयमां जे बधा गुणो छे ते पवित्र छे. अहाहा...! आवा पवित्र ध्येयवाळी द्रष्टि एम माने छे के आ रागना दया, दान, व्रतादिना अने सुखदुःखना जे परिणाम थया ते बधुं पुद्गलनुं कार्य छे, हुं तो तेनो जाणनार (साक्षी) छुं, हुं एनो करनारो के एनो भोगवनारो नहि; परंतु द्रष्टिनी साथे जे ज्ञान (प्रमाणज्ञान) छे ते ते काळे त्रिकाळी शुद्धनेय जाणे छे अने वर्तमान थता राग अने सुख-दुःखना वेदननी दशाने पण जाणे छे. जाणे छे एटले के रागनुं वेदन पर्यायमां छे एम जाणे छे.
जुओ, वस्तु अने वस्तुना स्वभावनुं जे परिणमन छे एनाथी सुखदुःखना परिणाम बाह्यस्थित छे. अंतरमां के अंतरनी परिणतिमां ए क्यां छे? (नथी). धर्मी जीव बाह्यस्थित एवा परद्रव्यपरिणाममां अंतर्व्यापक थईने आदि-मध्य-अंतमां व्यापीने एने ग्रहतो नथी. एटले के ए परद्रव्यपरिणाम एनाथी थया छे एम नथी. शुद्धस्वभावथी सुखदुःखना विकारी परिणाम केम थाय? परंतु पर्यायमां पोतानी योग्यताथी सुखदुःखना जे परिणाम थाय तेने जोनारुं ज्ञान एम जाणे छे के पर्यायमां सुखदुःखनुं वेदन छे. अहाहा...! मार्ग तो आवो छे, प्रभु! आवो भगवाननो अनेकांत मार्ग छे. अनेकांत एटले अनेक अंत-धर्म. स्वभावनी द्रष्टिए रागना परिणाम जीवना नहि अने पर्यायद्रष्टिए जोतां ए परिणाम जीवना छे. भाई! वस्तुनुं स्वरूप आवुं छे. भगवाने कांई कर्युं नथी, भगवाने तो जेवुं जाण्युं तेवुं कह्युं छे.
हवे कहे छे-‘माटे, जोके ज्ञानी सुखदुःखादिरूप पुद्गलकर्मना फळने जाणे छे तोपण, प्राप्य, विकार्य अने निर्वर्त्य एवुं जे व्याप्यलक्षणवाळुं परद्रव्यपरिणामस्वरूप कर्म, तेने नहि करता एवा ज्ञानीने पुद्गल साथे कर्ताकर्मभाव नथी.’ हरखशोकना भावने ज्ञानी करतो नथी एम कहे छे. तेने जाणे भले, पोतानी ज्ञानपर्यायनी आदिमां ज्ञाता छे तेथी जाणे भले, पण एने करे अने भोगवे ते ज्ञानीनुं स्वरूप नथी.
७६मी गाथामां कह्युं हतुं ते अनुसार अहीं पण भावार्थ जाणवो. त्यां ‘पुद्गलकर्मने जाणतो ज्ञानी’ एम कह्युं हतुं तेने बदले अहीं ‘पुद्गलकर्मना फळने जाणतो ज्ञानी’ एम कह्युं छे-एटलुं विशेष छे. गाथा ७८ पूरी थई.