समयसार गाथा ७९ ] [ १४३
अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत्
भावार्थः– कोई एम जाणे के पुद्गल के जे जड छे अने कोईने जाणतुं नथी तेने जीवनी साथे कर्ताकर्मपणुं हशे. परंतु एम पण नथी. पुद्गलद्रव्य जीवने उत्पन्न करी शकतुं नथी, परिणमावी शकतुं नथी तेम ज ग्रही शकतुं नथी तेथी तेने जीव साथे कर्ताकर्मपणुं नथी. परमार्थे कोई पण द्रव्यने कोई अन्य द्रव्यनी साथे कर्ताकर्मभाव नथी. हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः- श्लोकार्थः– [ज्ञानी] ज्ञानी तो [इमां स्वपरपरिणतिं] पोतानी अने परनी परिणतिने [जानन् अपि] जाणतो प्रवर्ते छे [च] अने [पुद्गलः अपि अजानन्] पुद्गलद्रव्य पोतानी अने परनी परिणतिने नहि जाणतुं प्रवर्ते छे; [नित्यम् अत्यन्त–भेदात्] आम तेमनामां सदा अत्यंत भेद होवाथी (बन्ने भिन्न द्रव्यो होवाथी), [अन्तः] ते बन्ने परस्पर अंतरंगमां [व्याप्तृव्याप्यत्वम्] व्याप्यव्यापकभावने [कलयितुम् असहौ] पामवा असमर्थ छे. [अनयोः कर्तृकर्मभ्रममतिः] जीव-पुद्गलने कर्ताकर्मपणुं छे एवी भ्रमबुद्धि [अज्ञानात्] अज्ञानने लीधे [तावत् भाति] त्यां सुधी भासे छे (-थाय छे) के [यावत्] ज्यां सुधी [विज्ञानार्चिः] (भेदज्ञान करनारी) विज्ञानज्योति [क्रकचवत् अदयं] करवतनी जेम निर्दय रीते (उग्र रीते) [सद्यः भेदम् उत्पाद्य] जीव-पुद्गलनो तत्काळ भेद उपजावीने [न चकास्ति] प्रकाशित थती नथी. भावार्थः– भेदज्ञान थया पछी, जीवने अने पुद्गलने कर्ताकर्मभाव छे एवी बुद्धि रहेती नथी; कारण के ज्यां सुधी भेदज्ञान थतुं नथी त्यां सुधी अज्ञानथी कर्ताकर्मभावनी बुद्धि थाय छे.
हवे पूछे छे के जीवना परिणामने, पोताना परिणामने, पोताना परिणामना फळने नहि जाणता एवा पुद्गलद्रव्यने जीव साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? अहीं जीवना परिणाम एटले वीतरागी निर्मळ परिणाम, पोताना परिणाम एटले रागादि परिणाम अने पोताना परिणामनुं फळ एटले सुखदुःखना परिणाम-आ बधाने नहि जाणतुं एवुं जे पुद्गलद्रव्य तेने जीव साथे कर्ताकर्मभाव छे के नथी? जुओ, जीवने स्वभावनी द्रष्टि थतां जे स्वभावनुं निर्मळ परिणमन थयुं तेने पुद्गल जाणतुं नथी. तेम पुद्गलपरिणाम जे रागादि भाव तेने पुद्गल जाणतुं नथी. तेम