१प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
स्वद्रव्य-परद्रव्यने वा तेना भावोने वा कारण-कार्यादिने कोईना कोईमां मेळवी निरूपण करे छे माटे एवा श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे तेथी तेनो त्याग करवो, वळी निश्चयनय तेने ज यथावत् निरूपण करे छे तथा कोईने कोईमां मेळवतो नथी तेथी एवा ज श्रद्धानथी सम्यक्त्व थाय छे माटे तेनुं श्रद्धान करवुं.’ शुभरागथी आत्माने लाभ थाय, व्यवहार साधन अने निश्चय साध्य-एम व्यवहारनय कथन करे पण एवा श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे एम त्यां कह्युं छे. माटे एवुं श्रद्धान त्यागवुं.
जुओ, रागना विकल्पथी भिन्न आत्मा सच्चिदानंदस्वरूप भगवान छे. एनो अनुभव थतां भेदज्ञान प्रगट थवाथी ज्ञानीने पुद्गल एटले राग साथे कर्ताकर्मपणानी बुद्धि रहेती नथी; तथापि ज्यांसुधी भेदज्ञान थतुं नथी त्यांसुधी जीवने अज्ञानथी कर्ताकर्मभावनी बुद्धि थाय छे. अहा! ज्ञायकस्वरूप भगवान आत्मा अने रागभाव ए बेनी ज्यांसुधी जीवने एकत्वबुद्धि छे त्यांसुधी राग मारुं कर्तव्य अने हुं एनो कर्ता एवुं अज्ञानपूर्वक जीव माने छे. भाई! आ तो सीधी वात छे. पोतानो दुराग्रह छोडी दे तो पकडाय एम छे. आवुं अनादिनुं अज्ञान छे ते भेदज्ञान प्रगट करी दूर करवुं जोईए एम अहीं आशय छे.