समयसार गाथा ७९ ] [ १प७
एम मानीए छीए के ‘पर जेनो आश्रय छे एवो व्यवहार ज सघळोय छोडाव्यो छे.’ तो पछी, आ सत्पुरुषो एक सम्यक् निश्चयने ज निष्कंपपणे अंगीकार करीने शुद्धज्ञानस्वरूप निज महिमामां स्थिरता केम धरता नथी?” हुं बीजाने जीवाडुं, मारुं, सुखी-दुःखी करुं-एवो जे अध्यवसान छे ते बधोय जिनभगवानोए त्यागवा योग्य कह्यो छे. बीजाने जीवाडी शकुं, मारी शकुं, सुख-दुःखना संयोग आपी शकुं-एवी मान्यता छे ए तो मिथ्यात्व छे केमके तुं परनुं कांई करी शकतो ज नथी ए सिद्धांत छे. तारो आ अध्यवसान मिथ्या छे तेथीए मान्यता पण मिथ्या छे. आचार्यदेव कहे छे के जिनभगवानोए अध्यवसान सघळाय त्यागवायोग्य कह्या छे माटे अमे एम मानीए छीए के पर जेनो आश्रय छे एवो व्यवहार ज सघळोय छोडाव्यो छे. व्यवहाररत्नत्रयनो राग पण पराश्रयभाव होवाथी छोडव्यो छे. आवी वात छे त्यां बीजी वात (व्यवहारथी लाभ थाय एवी वात) कई रीते करवी भाई?
शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय इत्यादि तो पर छे. एने आत्मा निश्चयथी ग्रहतोय नथी अने छोडतोय नथी. आत्मा परना ग्रहण-त्यागथी शून्य छे एवी त्याग-उपादानशून्यत्व नामनी आत्मामां एक शक्ति छे. माटे आत्मा परना ग्रहण-त्यागथी रहित छे. माटे परना ग्रहण-त्यागनो जे राग छे ए मिथ्याबुद्धि छे. अहाहा...! अनंता तीर्थंकरोए आम कह्युं छे. कह्युंछे ने के व्यवहार सघळोय जिनदेवोए छोडाव्यो छे तो सत्पुरुषो एक सम्यक् निश्चयने ज निष्कंपपणे अंगीकार करीने शुद्ध ज्ञानघनरूप पोताना महिमामां स्थिति केम करता नथी? निष्कंपपणे एटले अति द्रढपणे पोताना स्वरूपमां केम स्थिरता करता नथी? पराश्रयथी लाभ थशे ए वात हवे जवा दे भाई! तारो मार्ग आ एक ज छे प्रभु! के ज्ञानानंदस्वरूप निज शुद्ध चैतन्य भगवान छे तेमां स्थिति कर.
श्री मोक्षमार्गप्रकाशकमां पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए पण आ ज कह्युं छे के-‘निश्चयनय वडे जे निरूपण कर्युं होय तेने सत्यार्थ मानी तेनुं श्रद्धान अंगीकार करवुं तथा व्यवहारनय वडे जे निरूपण कर्युं होय तेने असत्यार्थ मानी तेनुं श्रद्धान छोडवुं.’ हवे आमां व्यवहार आदरणीय छे ए वात कयां रही? पूर्ण वीतरागभाव न थाय त्यां सुधी निश्चयनी साथे व्यवहारनो राग होय खरो, पण ते आदरणीय छे के तेनाथी लाभ थाय छे-एम वात ज नथी.
पहेलां सांभळ्युं न होय एटले घणाने आ मार्ग नवो लागे छे, पण आ तो अनादिथी चाल्यो आवतो मार्ग छे. अनंता जिन भगवानोए कहेलो ए आ ज मार्ग छे. मोक्षमार्गप्रकाशकमां पान २पप पर कह्युं छे के- ‘जे व्यवहारमां सूता छे ते योगी पोताना कार्यमां जागे छे तथा जे व्यवहारमां जागे छे ते पोताना कार्यमां सूता छे.’ अहा! रागना भावमां जे जाग्रतपणे ऊभा छे ते निजकार्यमां सूता छे. माटे व्यवहारनुं श्रद्धान छोडी निश्चयनुं श्रद्धान करवुं योग्य छे. वळी त्यां कह्युं छे के-‘व्यवहारनय