Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२०४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

अहीं तो अज्ञानीना रागने व्यवहार कह्यो छे. एनो अर्थ एम छे के अज्ञानी अनादिथी रूढपणे हुं परद्रव्यनो कर्ता-भोक्ता छुं एवी विपरीत मान्यता सहित जे एनी रागादि प्रवृत्ति छे तेने अज्ञानीओनो अहीं प्रसिद्ध व्यवहार छे एम कह्युं छे. अहा! जे राग थयो ते पोतानी जीवनी पर्याय छे अने तेना निमित्ते जे कर्मबंधन थयुं ते जड पुद्गलनी पर्याय छे. आम होवा छतां अनादि संसारथी अज्ञानीओ भ्रमथी माने छे के मने राग थयो तो कर्मबंधन थयुं. आवा विपरीत अज्ञानमय विकल्पने अहीं अज्ञानीनो प्रसिद्ध व्यवहार कह्यो छे.

[प्रवचन नं. १४३, १४४ * दिनांक १-८-७६ थी २-८-७६]
ॐ ॐ ॐ ॐ