Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ८४ ] [ २०३

कर्मनो बंध थाय छे एम अज्ञानी भ्रमथी माने छे में रागद्वेष कर्यो तेथी कर्मने बंधावुं पडयुं एम अज्ञानी माने छे. पण एम छे नहि. ते समये कर्मनी पर्याय जे थवा योग्य हती ते पुद्गलथी थई छे. तेनी उत्पत्तिनी ते जन्मक्षण छे. राग कर्यो माटे चारित्रमोहनो बंध थयो एम छे ज नहि. कर्मनुं परिणमन पोताथी स्वकाळे स्वतंत्र थयुं छे. आम वस्तुस्थिति छे. छतां जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे. एवो अज्ञानीनो अनादिकाळथी प्रसिद्ध व्यवहार छे.

‘परमार्थे जीव-पुद्गलनी प्रवृत्ति भिन्न होवा छतां, ज्यां सुधी भेदज्ञान न होय त्यां सुधी बहारथी तेमनी प्रवृत्ति एक जेवी देखाय छे.’ रागना निमित्ते कर्मबंधन थयुं त्यां निमित्तने देखनाराओने पोताथी परमां कार्य थयुं एम देखाय छे, अज्ञानीने जीव-पुद्गलनुं भेदज्ञान नहि होवाथी, बन्नेनी भिन्नता नहि भासी होवाथी उपलक ‘द्रष्टिए जेवुं देखाय तेवुं मानी ले छे; तेथी ते एम माने छे के जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे.

‘श्री गुरु भेदज्ञान करावी, परमार्थ जीवनुं स्वरूप बतावीने, अज्ञानीना ए प्रतिभासने व्यवहार कहे छे.’ कर्मनी पर्यायने आत्मा करतो नथी अने कर्मनी पर्याय विकार उत्पन्न करती नथी. - आवुं समजाववानुं प्रयोजन परथी स्वनुं भेदज्ञान कराववानुं छे. अहा! जडकर्मनो कर्ता तो आत्मा नथी पण ए समये जे राग थाय छे ते रागनो कर्ता निश्चये आत्मा नथी.

श्री गुरु भेदज्ञान करावे छे एटले भेदज्ञान करवानो उपदेश आपे छे. करावे कोण? अने उपदेश आपे छे एम कहेवुं ए पण व्यवहारनुं वचन छे. वाणीना काळे वाणी थाय छे. वाणीनी उत्पत्तिनी ते जन्मक्षण छे तेथी वाणी उत्पन्न थई छे. विकल्प थयो के हुं बोलुं तेथी भाषानी पर्याय थई छे एम नथी. श्री गुरु भेदज्ञान कराववा समजावे छे के-भाई! राग तारुं कर्तव्य नथी. रागनुं कर्तव्य माने त्यां सुधी अज्ञान छे. रागना निमित्ते कर्म बंधाय त्यां ते काळे पुद्गलमां कर्मपर्याय थवानो काळ छे तेथी कर्मबंधनी दशा थई छे, तारा कारणे थई नथी. तें राग कर्यो माटे त्यां कर्मबंधन थयुं एम माने ए मिथ्यात्व छे.

अज्ञानीना ए प्रतिभासने व्यवहार कहे छे. हवे अज्ञानीना आ व्यवहारने दूषण दे छे. हुं परनो कर्ता-भोक्ता छुं एवो अज्ञानीनो जे व्यवहार छे ते सदोष छे. मिथ्यात्वसहित छे एम कहे छे.

प्रश्नः– अज्ञानीने तो व्यवहार होतो नथी?

उत्तरः– हा, ज्ञानी के जेने निज चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मानुं भान थयुं छे तेने सहचरपणे जे राग होय छे तेने व्यवहार कहेवामां आवे छे. पण ए वात अहीं नथी.