२०२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
नथी पण ते डंख -समये जे द्वेष ना विकारी परिणाम थाय तेने ते भोगवे छे. कर्मविपाकने अनुकूळ जे जे कल्पना थाय तेने ते अनुभवे छे. अनुकूळनो अर्थ निमित्त छे, पण निमित्त कर्ता नथी. ईष्टोपदेश गाथा ३प मां आवे छे के कार्यनी उत्पत्तिमां जे अनुकूळ निमित्त होय छे ते बधां धर्मास्तिकायवत् उदासीन निमित्त छे. प्रेरक निमित्त हो के उदासीन. कार्यनी उत्पत्तिमां ते उदासीन निमित्त ज छे. परने निकट देखीने हुं परने भोगवुं छुं एवी मान्यता अज्ञान छे, मिथ्यात्व छे.
आवी परम सत्य वात बहार आवी छे. कोई न माने तो न मानो, वा आ तो निश्चय छे एम कही निंदा करे तो करो; पण मार्ग तो आज छे भाई! नियमसारमां (गाथा १८६मां) आवे छे के लोकात्तर एवो जिनेश्वरभगवाननो मार्ग जेने न बेसे ते स्वरूपविकळ लोको मार्गनी निंदा करे तो तुं मार्गनी अभक्ति करीश नही; भक्ति ज करजे.
एक छोकरो हतो. एक बीजा छोकराए तेने थपाट मारी. त्यारे त्यांथी पसार थता कोई सज्जन पुरुषे तेने ठपको आप्यो. तो ते बीजो छोकरो कहेवा लाव्यो. - “शास्त्रमां तो एम आवे छे के कोइ कोईने मारी शकतुं नथी.” अरे भाई! आवा कुतर्क न शोभे. मारवानो जे भाव (क्रोधनो) थयो ते आत्मानुं कार्य छे अने ते आत्मानी पोतानी हिंसानो ज भाव छे. परद्रव्योनो आत्मा कर्ता-भोक्ता नथी पण पोताना रागद्वेष परिणामोनो तो अज्ञानी अवश्य कर्ता-भोक्ता छे.
‘पुद्गलकर्मने परमार्थे पुद्गलद्रव्य ज करे छे; जीव तो पुद्गलकर्मनी उत्पत्तिने अनुकूळ एवा पोताना रागादिक परिणामोने करे छे.’
जुओ, पुद्गलकर्म छे ते पर्याय छे अने तेने पुद्गलद्रव्य ज करे छे, जीव नहि. जीव तो पुद्गलकर्मनी उत्पत्तिने अनुकूळ एवा पोताना राग-द्वेषना परिणामने करे छे. कर्मनो बंध थाय एमां जीवना रागादि परिणाम निमित्त छे; पण एनाथी पुद्गलकर्मनी पर्याय थाय छे एम नथी. ल्यो, अहीं तो निमित्तथी थतुं नथी एम स्पष्ट कह्युं छे.
‘वळी पुद्गलद्रव्य ज पुद्गलकर्मने भोगवे छे; जीव तो पुद्गलकर्मना निमित्तथी थता पोताना रागादिक परिणामोने भोगवे छे.’ अहीं एम कह्युं के पुद्गलकर्मना निमित्तथी थता पोताना परिणामोने जीव भोगवे छे. जीव पोताना विकारी परिणामने करे छे अने ते परिणाम भोगवे छे. जीव कर्मने भोगवे छे एम छे ज नहि पुद्गलद्रव्य ज पुद्गलकर्मने भोगवे छे.
‘परंतु जीव अने पुद्गलनो आवो निमित्तनैमित्तिकभाव देखीने अज्ञानीने एवो भ्रम छे के पुद्गलकर्मने जीव करे छे अने भोगवे छे’ हुं रागद्वेष करुं छुं तो पुद्गल-