समयसार गाथा ८४ ] [ २०१
भावथी जीव भोगवे छे. जेम घडानी अवस्थामां कुंभारनो राग व्यापक छे एम नथी तेम पुद्गलकर्मनी अवस्थामां जीवनो राग व्यापक थईने पुद्गलकर्म करे छे एम नथी. पुद्गलद्रव्य ज व्याप्यव्यापकपणे कर्म करे छे अने पुद्गलद्रव्य ज भाव्यभावकभावथी जड कर्मने भोगवे छे. जे काळे जडकर्मनो पुद्गलकर्ता अने भोक्ता थाय छे ते काळमां जीव तेने अनुकूळ राग-द्वेष करे छे. निमित्तने अनुकूळ कहेवामां आवे छे, अने सामेनी चीज उपादानने अनुरूप कहेवामां आवे छे. गाथा ८६मां अनुकूळ अने अनुरूपनी वात आवे छे. नैमित्तिकने अनुरूप कहे छे. कर्म पोताथी बंधाय छे तेमां अज्ञानीना राग-द्वेष अनुकूळ छे एटले निमित्त छे.
आ तो सिद्धांतनी भाषा छे. थोडा शब्दोमां गंभीर भावो भर्या छे. जडकर्म पोतामां पोताना कारणे व्याप्यव्यापकपणे एटले कर्ताकर्मपणे परिणमे छे. तेमां जीवना विकारी परिणाम अनुकूळ निमित्त छे. तेम जडकर्म पोतामां भाव्यभावकपणे पोताने भोगवे छे. त्यां जीवना विकारी परिणाम अनुकूळ निमित्त छे. कर्ता-भोक्तापणे पुद्गलकर्मनी अवस्था तो पोते पोताथी थई छे ते काळे जीवना रागादि परिणाम अनुकूळ निमित्त छे. निमित्त छे तो पुद्गलकर्मनी पर्याय थई छे एम नथी. आवी वस्तु छे, भाई! थोडो न्याय फरे तो आखी वस्तु फरी जाय. जेम कोई नदीना कांठे ऊभो रहीने पाणीने जुए तेम पुद्गलमां ज्यारे कार्य थाय छे त्यारे नजीकमां कांठे रहेली जे भिन्न चीज छे तेने एनुं निमित्त कहेवामां आवे छे. आवी सर्वज्ञ परमेश्वरनी दिव्यध्वनिमां आवेली आ वात छे.
प्रथम माटीनुं द्रष्टांत आपीने सिद्धांत समजाव्यो छे. कर्मनी ज्ञानावरणरूप जे अवस्था थाय तेमां परमाणु पोते अंतर्व्यापक थईने व्याप्य कर्मनी पर्यायने करे छे, तेमां जीवनो राग निमित्त छे. तेम विपाकने प्राप्त थयेली ते कर्मनी पर्याय छूटी जाय छे त्यां पुद्गल ते कर्मनी पर्यायने भोगवे छे. कर्मनी अवस्था भाव्य अने पुद्गल तेनुं भावक छे; अने तेमां अज्ञानीनो राग तेने अनुकूळ निमित्त छे. ते रागने करतो अने विषयोनी निकटताथी ऊपजेली पोतानी सुखदुःखरूप परिणतिने भोगवतो (अज्ञानी) जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे एवो अज्ञानीओनो अनादि संसारथी प्रसिद्ध व्यवहार छे, अने ते जूठो व्यवहार छे.
जुओ, अज्ञानी भाव्यभावकभावथी विषयोनी निकटताथी ऊपजेली पोतानी सुखदुःखरूप परिणतिने भोगवे छे पण विषयोने भोगवतो नथी. स्त्रीना शरीरने, दाळ- भात-लाडुने के मोसंबी ना रसने ते भोगवतो नथी. स्त्री, शरीर, कुटुंब, धनसंपत्ति ईत्यादि जे निकट आव्यां छे तेमां लक्ष करीने अज्ञानी पोताना हरखशोकना परिणामने भाव्यभावकपणे भोगवे छे पण ते पर पदार्थोने भोगवतो नथी. वींछीना डंखने ते भोगवतो