Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२०० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

आ तो बहु गंभीर शास्त्र छे. समयसार जगतनुं अजोड चक्षु छे. तेने समजवा ध्यानथी बहु अभ्यास करवो जोईए. संसारना भणतरमां बी. ए. एम. ए. आदि थवामां केटलां वर्ष महेनत करे छे! छतां ए तो बधुं अज्ञान ज छे. अरे भाई! अनंतवार ए बधुं कर्युं छे. आ तत्त्वज्ञानना अभ्यास माटे वखत लेवो जोईए. कुंभार घडानी उत्पत्तिमां अनुकूळ एवा ईच्छारूप अने हस्तादिकनी क्रियारूप पोताना व्यापारने करे छे. अने घडाना उपयोगथी उपजेली तृप्तिने कुंभार अनुभवे-भोगवे छे. एवो कुंभार घडाने करे छे अने भोगवे छे एवो लोकोनो अनादिथी रूढ व्यवहार छे. अंदरमां माटी घडानी पर्यायने करे छे अने घडानी पर्यायने भोगवे छे. बहारमां कुंभार पोतानी ईच्छा अने योगना कंपनरूप पोताना कार्यने व्याप्यव्यापकभावथी करे छे अने घडाना उपयोगथी उपजेली तृप्तिने पोते भोगवे छे. आ देखीने अज्ञाननी एम लागे छे के घडानो कर्ता अने घडानो भोक्ता कुंभार छे. आवुं माननार मिथ्याद्रष्टि छे. घडानी पर्यायमां व्याप्यव्यापक अने भाव्यभाक पुद्गल छे. आत्मा (कुंभार) घडाने करे छे अने भाव्यभावकपणे भोगवे छे एम छे ज नहि. आ द्रष्टांत थयुं. हवे सिद्धांत कहे छे. - ‘तेवी रीते, अंदरमां व्याप्यव्यापकभावथी पुद्गलद्रव्य कर्मने करे छे अने भाव्यभावकभावथी पुद्गलद्रव्य ज कर्मने भोगवे छे.’ जुओ, पुद्गल व्यापक अने कर्म एनुं व्याप्य छे. तेथी जडकर्मने व्याप्यव्याकभावे पुद्गल करे छे. अने पुद्गलद्रव्य ज कर्मने भोगवे छे. पुद्गल पोते भाव्य एटले भोगववा योगय कर्मनी अवस्थाने भावकपणे भोगवे छे. पुद्गलद्रव्यमां एवी भोक्ता शक्ति छे जेथी पुद्गल कर्मने भोगवे छे. कर्मनी प्रकृतिबंधना चार प्रकार छेः प्रकृतिबंध, प्रदेशबंध, स्थितिबंध अने अनुभागबंध. तत्त्वार्थसूत्रमां आवे छे - ‘विपाको अनुभवः’ कर्मना विपाकोना अनुभव जीव करे छे. पण आ तो व्यवहारनुं निमित्तथी कथन छे. खरेखर कर्मनो अनुभव जीव करतो नथी. कर्मनो विपाक तो कर्ममां छे. जीव तो पोताना रागद्वेषनो अनुभव करे छे. अहीं कहे छे के व्याप्यव्यापकभावथी पुद्गल कर्मनुं कर्ता छे अने भाव्यभावकभावथी पुद्गल जडकर्मनुं भोक्ता छे ‘तोपण, बहारमां, व्याप्यापकभावथी अज्ञानने लीधु पुद्गलकर्मना संभवने अनुकूळ एवा पोताना रागादिक परिणामने करतो अने पुद्गकर्मना विपाकथी उत्पन्न थयेली विषयोनी जे निकटता तेनाथी ऊपजेली पोतानी सुखदुःखरूप परिणतिने भाव्यभावकभाव वडे अनुभवतो-भोगवतो एवो जीव पुद्गलकर्मने करे छे अने भोगवे छे एवो अज्ञानीओनो संसारथी प्रसिद्ध व्यवहारछे.’ बहारमां जीव अज्ञाना कारणे व्याप्यव्यापकभावथी पोताना रागादिक परिणामने करे छे, अने विषयोनी निकटताथी ऊपजेली पोतानी सुखदुःखरूप परिणतिने भाव्यभावक-