क्रमप्रवृत्ताभिरनन्ताभिर्ज्ञप्तिव्यक्तिभिः परिवर्तमानस्य ज्ञप्तिव्यक्तिनिमित्ततया ज्ञेयभूतासु बहिरर्थव्यक्तिषु प्रवृत्तमैत्रीकस्य शिथिलितात्मविवेकतयात्यन्तबहिर्मुखस्य पुनः पौद्गलिककर्म- निर्मापकरागद्वेषद्वैतमनुवर्तमानस्य दूरत एवात्मावाप्तिः । अथ यदा त्वयमेव प्रचण्डकर्म- काण्डोच्चण्डीकृताखण्डज्ञानकाण्डत्वेनानादिपौद्गलिकक र्मनिर्मितस्य मोहस्य वध्यघातकविभाग- ज्ञानपूर्वकविभागकरणात् केवलात्मभावानुभावनिश्चलीकृतवृत्तितया तोयाकर इवात्मन्येवाति- निष्प्रकम्पस्तिष्ठन् युगपदेव व्याप्यानन्ता ज्ञप्तिव्यक्तीरवकाशाभावान्न जातु विवर्तते, तदास्य ज्ञप्तिव्यक्तिनिमित्ततया ज्ञेयभूतासु बहिरर्थव्यक्तिषु न नाम मैत्री प्रवर्तते; ततः सुप्रतिष्ठितात्मविवेकतयात्यन्तमन्तर्मुखीभूतः पौद्गलिककर्मनिर्मापकरागद्वेषद्वैतानुवृत्तिदूरीभूतो दूरत एवाननुभूतपूर्वमपूर्वज्ञानानन्दस्वभावं भगवन्तमात्मानमवाप्नोति । अवाप्नोत्वेव ज्ञानानन्दात्मानं जगदपि परमात्मानमिति । लक्षणसुखामृतरसास्वादानुभवलाभे सत्यमावास्या दिवसे जलकल्लोलक्षोभरहितसमुद्र इव रागद्वेष- मोहकल्लोलक्षोभरहितप्रस्तावे यदा निजशुद्धात्मस्वरूपे स्थिरो भवति तदा तदैव निजशुद्धात्मस्वरूपं प्राप्नोति ।। अपनेमें ही क्षुब्ध होता हुआ क्रमशः प्रवर्तमान अनन्त १ज्ञप्तिव्यक्तियोंसे परिवर्तनको प्राप्त होता है, इसलिये ज्ञप्तिव्यक्तियोंके निमित्तरूप होनेसे जो ज्ञेयभूत हैं ऐसी बाह्यपदार्थव्यक्तियोंके प्रति उसकी मैत्री प्रवर्तती है, इसलिये आत्मविवेक शिथिल हुआ होनेसे अत्यन्त बहिर्मुख ऐसा वह पुनः पौद्गलिक कर्मके रचयिता रागद्वेषद्वैतरूप परिणमित होता है और इसलिये उसके आत्मप्राप्ति दूर ही है । परन्तु अब जब यही आत्मा प्रचण्ड कर्मकाण्ड द्वारा अखण्ड ज्ञानकांडको प्रचंड करनेसे अनादि – पौद्गलिक – कर्मरचित मोहको २वध्य – घातकके विभागज्ञानपूर्वक विभक्त करनेसे (स्वयं) केवल आत्मभावनाके [आत्मानुभवके ] प्रभावसे परिणति निश्चलकी होनेसे समुद्रकी भाँति अपनेमें ही अति निष्कंप रहता हुआ एक साथ ही अनन्त ज्ञप्तिव्यक्तियोंमें व्याप्त होकर अवकाशके अभावके कारण सर्वथा विवर्तन [परिवर्तन ] को प्राप्त नहीं होता, तब ज्ञप्तिव्यक्तियोंके निमित्तरूप होनेसे जो ज्ञेयभूत हैं ऐसी बाह्यपदार्थव्यक्तियोंके प्रति उसे वास्तवमें मैत्री नहीं प्रवर्तती और इसलिये आत्मविवेक सुप्रतिष्ठित [सुस्थित ] हुआ होनेके कारण अत्यन्त अन्तर्मुख हुआ ऐसा यह आत्मा पौद्गलिक कर्मोंके रचयिता रागद्वेषद्वैतरूप परिणतिसे दूर होता हुआ पूर्वमें अनुभव नहीं किये गये अपूर्व ज्ञानानन्दस्वभावी भगवान् आत्माको आत्यंतिक रूपसे ही प्राप्त करता है । जगत भी ज्ञानानन्दात्मक परमात्माको अवश्य प्राप्त करो ।
१. व्यक्तियों = प्रगटताओं; पर्यायों; विशेषों । [बाह्यपदार्थविशेष ज्ञप्तिविशेषोंके निमित्त होनेसे ज्ञेयभूत हैं । ]
२. आत्मा वध्य (हनन योग्य) है और मोह घातक (हननेवाला) है ।