Pravachansar (Hindi).

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यतः शेषसमस्तचेतनाचेतनवस्तुसमवायसंबन्धनिरुत्सुक तयाऽनाद्यनन्तस्वभावसिद्ध- समवायसंबन्धमेक मात्मानमाभिमुख्येनावलम्ब्य प्रवृत्तत्वात् तं विना आत्मानं ज्ञानं न धारयति, ततो ज्ञानमात्मैव स्यात् आत्मा त्वनन्तधर्माधिष्ठानत्वात् ज्ञानधर्मद्वारेण ज्ञानमन्यधर्म- द्वारेणान्यदपि स्यात्

किं चानेकान्तोऽत्र बलवान् एकान्तेन ज्ञानमात्मेति ज्ञानस्या -भावोऽचेतनत्वमात्मनो विशेषगुणाभावादभावो वा स्यात् सर्वथात्मा ज्ञानमिति निराश्रयत्वात् ज्ञानस्याभाव आत्मनः शेषपर्यायाभावस्तदविनाभाविनस्तस्याप्यभावः स्यात् ।।२७।। घटपटादौ न वर्तते तम्हा णाणं अप्पा तस्मात् ज्ञायते कथंचिज्ज्ञानमात्मैव स्यात् इति गाथापादत्रयेण ज्ञानस्य कथंचिदात्मत्वं स्थापितम् अप्पा णाणं व अण्णं वा आत्मा तु ज्ञानधर्मद्वारेण ज्ञानं भवति, सुखवीर्यादिधर्मद्वारेणान्यद्वा नियमो नास्तीति तद्यथायदि पुनरेकान्तेन ज्ञानमात्मेति भण्यते तदा ज्ञानगुणमात्र एवात्मा प्राप्तः सुखादिधर्माणामवकाशो नास्ति तथा सुखवीर्यादिधर्मसमूहाभावादात्मा- भावः, आत्मन आधारभूतस्याभावादाधेयभूतस्य ज्ञानगुणस्याप्यभावः, इत्येकान्ते सति द्वयोरप्यभावः तस्मात्कथंचिज्ज्ञानमात्मा न सर्वथेति अयमत्राभिप्रायःआत्मा व्यापको ज्ञानं व्याप्यं ततो ज्ञानमात्मा स्यात्, आत्मा तु ज्ञानमन्यद्वा भवतीति तथा चोक्तम्‘व्यापकं तदतन्निष्ठं व्याप्यं

टीका :क्योंकि शेष समस्त चेतन तथा अचेतन वस्तुओंके साथ समवायसम्बन्ध नहीं है, इसलिये जिसके साथ अनादि अनन्त स्वभावसिद्ध समवायसम्बन्ध है ऐसे एक आत्माका अति निकटतया (अभिन्न प्रदेशरूपसे) अवलम्बन करके प्रवर्तमान होनेसे ज्ञान आत्माके बिना अपना अस्तित्व नहीं रख सकता; इसलिये ज्ञान आत्मा ही है और आत्मा तो अनन्त धर्मोंका अधिष्ठान (-आधार) होनेसे ज्ञानधर्मके द्वारा ज्ञान है और अन्य धर्मके द्वारा अन्य भी है

और फि र, इसके अतिरिक्त (विशेष समझना कि) यहाँ अनेकान्त बलवान है यदि यह माना जाय कि एकान्तसे ज्ञान आत्मा है तो, (ज्ञानगुण आत्मद्रव्य हो जानेसे) ज्ञानका अभाव हो जायेगा, (और ज्ञानगुणका अभाव होनेसे) आत्माके अचेतनता आ जायेगी अथवा विशेषगुणका अभाव होनेसे आत्माका अभाव हो जायेगा यदि यह माना जाये कि सर्वथा आत्मा ज्ञान है तो, (आत्मद्रव्य एक ज्ञानगुणरूप हो जानेपर ज्ञानका कोई आधारभूत द्रव्य नहीं रहनेसे) निराश्रयताके कारण ज्ञानका अभाव हो जायेगा अथवा (आत्मद्रव्यके एक ज्ञानगुणरूप हो जानेसे) आत्माकी शेष पर्यायोंका (सुख, वीर्यादि गुणोंका) अभाव हो जायेगा और उनके

गुण नहीं होते वहाँ गुणी नहीं होता और जहाँ गुणी नहीं होता वहाँ गुण नहीं होतेइस प्रकार गुण-
गुणीका अभिन्न -प्रदेशरूप सम्बन्ध; तादात्म्यसम्बन्ध है

४६प्रवचनसार[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

१. समवाय सम्बन्ध = जहाँ गुण होते हैं वहाँ गुणी होता है और जहाँ गुणी होता है वहाँ गुण होते हैं, जहाँ