Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

तयोरपहरणे अयमर्थःदर्शनमोहापहरणे दर्शनलाभः तिमिरापहरणे सति दर्शनलाभादवाप्तसंज्ञानः भवत्यात्मा ज्ञानावरणापगमे हि ज्ञानमुत्पद्यमानं सद्दर्शनप्रसादात् सम्यग्व्यपदेशं लभते, तथाभूतश्चात्मा चारित्रमोहापगमे चरणं प्रतिपद्यते किमर्थं ? ‘रागद्वेषनिवृत्त्यै’ रागद्वेषनिवृत्तिनिमित्तं ।।४७।। ते बंने दूर थतां (सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थई). आनो अर्थ ए छे केदर्शनमोह दूर थतां सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थाय छे अने ज्ञानावरणादिकरूप अंधकारनो नाश थतां सम्यग्दर्शननी प्राप्तिथी आत्मा सम्यग्ज्ञानी थाय छे. ज्ञानावरणनो अभाव थतां (क्षयोपशम थतां) जे ज्ञान उत्पन्न (प्रगट) थाय छे, ते सम्यग्दर्शनना प्रसादथी सम्यक् नाम पामे छे. (ज्ञान सम्यग्ज्ञाननी संज्ञा प्राप्त करे छे) अने आवो आत्मा, चारित्रमोहनो नाश थतां, चारित्र अंगीकार करे छे. शा माटे?

रागद्वेषनिवृत्त्यै’ रागद्वेषनी निवृत्ति माटे (ते चारित्र ग्रहण

करे छे.)

भावार्थ :मिथ्यात्वरूप अंधकार दूर थतांदर्शनमोहनीय अने अनंतानुबंधी कषाय वेदनीय (चारित्रमोहनीय)नो उपशम, क्षयोपशम के क्षय थतां, सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थवाथी जेनुं ज्ञान सम्यग्ज्ञान थयुं छे तेवो भव्य आत्मा, रागद्वेषने दूर करवा माटे चारित्र अंगीकार करे छे.

आ श्लोकमां आचार्ये मुख्य बे बाबतो दर्शावी छे(१) चारित्र धारण करनारनी योग्यता अने (२) चारित्र धारण करवानो उद्देश्य. ज्यारे जीवने सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे, त्यारे ज ते सम्यक्चारित्र धारण करवाने पात्र बने छे; ते सिवाय तेनुं चारित्र मिथ्याचारित्र नाम पामे छे. रागद्वेषादिनो अभाव करवो ते सम्यक्चारित्र धारण करवानो उद्देश्य छे.

जेम जे समये अंधकार नाश पामे छे ते ज समये प्रकाश उत्पन्न थाय छे, (अंधकारनो नाश अने प्रकाशनो उत्पाद बंने एक ज समये होय छे.) तेम जे समये दर्शनमोहादिनो अभाव थाय छे ते ज समये सम्यक्त्वनी उत्पत्ति थाय छे, अने जे समये सम्यक्त्वनी उत्पत्ति थाय छे ते ज समये पूर्वनुं मति अज्ञान अने श्रुत अज्ञानबंने सम्यक्रूपे परिणमे छे.

जेम मेघपटलनो अभाव थतांनी साथे ज (युगपद्) सूर्यनो प्रताप अने प्रकाश १. जुओ पुरुषार्थसिद्धिउपाय श्लोक ३७, ३८.