कहानजैनशास्त्रमाळा ]
करतां, तेने राज्य के समाजना नीति – नियमोनुं सहेजे पालन थई जाय छे, ते राज्य के समाजनो कदी गुन्हेगार बनतो नथी.)
त्रस जीवोनी संकल्पी हिंसानो त्याग ते स्थूळ हिंसानो त्याग छे, जे वचन बोलवाथी अन्य प्राणीनो घात थाय, धर्म बगडी जाय, अन्यने अपवाद लागे, कलह – संकलेश – भयादिक प्रगटे, तेवां वचनो क्रोधादिवश न बोलवां ते स्थूळ असत्यनो त्याग छे; आप्या विना अन्यनुं धन लोभवश छल करीने ग्रहण करवुं नहि ते स्थूळ चोरीनो त्याग छे; पोतानी विवाहित स्त्री सिवाय समस्त अन्यनी स्त्रीओमां कामनी अभिलाषानो त्याग ते स्थूळ काम (मैथुन)नो त्याग छे; धन – धान्यादि दश प्रकारना परिग्रहनुं परिमाण करी तेनाथी अधिक परिग्रहनो त्याग ते स्थूळ परिग्रहनो त्याग छे.
‘‘आत्माना शुद्धोपयोगरूप परिणामोनो घात थवाना हेतुथी आ बधुं (हिंसादि पांच पाप) हिंसा ज छे. अनृत (जूठ) वचनादिकना भेद केवळ शिष्योने समजाववा माटे उदाहरणरूप कह्या छे.१ ५२.
तेमां प्रथम व्रतनुं (अहिंसाणुव्रतनुं) प्रत्याख्यान करवा माटे कहे छे —
अन्वयार्थ : — [यत् ] जे [योगत्रयस्य ] मन, वचन अने काय ए त्रण योगना [कृतकारितानुमननात् ] कृत, कारित अने अनुमोदनारूप [संकल्पात् ] संकल्पथी [चरसत्त्वान् ] त्रस जीवोने [न हिनस्ति ] न हणवुं, [तत् ] तेने (क्रियाने) [निपुणाः ] वस्तुस्वरूपनो विचार करवामां निपुण आचार्यादिक [स्थूलवधात् ] स्थूळ हिंसाथी [विरमणम् ] विरति अर्थात् अहिंसाणुव्रत [आहुः ] कहे छे. १. पुरुषार्थसिद्धि – उपाय श्लोक ४२.