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‘व्यतीचारा’ विविधा विरूपका वा अतीचारा दोषाः । कति ? ‘पंच’ । कस्य ? थाय एम मानवुं ए भ्रम छे. तेथी व्रत – अव्रत ए बंने विकल्प रहित, ज्यां परद्रव्यना ग्रहण – त्यागनुं कांई प्रयोजन नथी एवो उदासीन वीतराग शुद्धोपयोग ते ज मोक्षमार्ग छे. नीचली दशामां केटलाक जीवोने शुद्धोपयोग अने शुभोपयोगनुं युक्तपणुं होय छे, तेथी ए व्रतादि शुभोपयोगने उपचारथी मोक्षमार्ग कह्यो छे, पण वस्तुविचारथी जोतां शुभोपयोग मोक्षनो घातक ज छे. आ रीते जे बंधनुं कारण छे ते ज मोक्षनुं घातक छे – एवुं श्रद्धान करवुं. शुद्धोपयोगने ज उपादेय गणी तेनो उपाय करवो तथा शुभोपयोग – अशुभोपयोगने हेय जाणी तेना त्यागनो उपाय करवो.....’’
आ श्लोकनी टीकामां आचार्ये कह्युं छे के — ‘अत्र कृतवचनं कर्तुः स्वातंत्र्य प्रतिपत्त्यर्थम्’ अहीं ‘कृत वचन’ ए कर्तानी स्वातंत्र्यनी प्रतिपत्ति अर्थे छे. आ बतावे छे के जीव पोताना भावोनो स्वतंत्रपणे कर्ता छे. कर्म मंद पड्या एटले कार्य थयुं एम नथी, पण ते स्वतंत्रपणे थयुं छे, तेनो कर्ता कर्म नथी. जो कर्म तेनो कर्ता होय तो बंने द्रव्योनी एकतानो प्रसंग आवे जे सिद्धान्त विरुद्ध छे. ५३.
हवे तेना (अहिंसाणुव्रतना) अतिचार कहे छे —
अन्वयार्थ : — [छेदनबन्धनपीडनम् ] (कान, नाक आदिनुं) छेदन, बंधन (इच्छित स्थाने जतां रोकवुं), पीडन (लाकडी, चाबूक आदिथी मारवुं), [अतिभारारोपणम् ] शक्तिथी अधिक भार लादवो, [च ] अने [आहारवारणा ] समयसर पूरतां आहार – पाणी न देवां – ए [पञ्च ] पांच [स्थूलवधात् ] स्थूळ हिंसाथी [व्युपरतेः ] विरतिना (अर्थात् स्थूळ हिंसा त्यागना अहिंसाणुव्रतना) [व्यतीचाराः ] अतिचारो छे.
टीका : — ‘व्यतीचारा’ विविध अथवा व्रतने विरूप विकृत करनारा दोषो केटला?