Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १५१

ए रीते अज्ञानथी आ जे हिंसामां अध्यवसाय करवामां आवे छे, तेम असत्य, अदत्त (चोरी), अब्रह्मचर्य अने परिग्रहमां पण जे (अध्यवसाय) करवामां आवे ते बधोय पापना बंधनुं एकमात्र कारण छे......’’

(श्री समयसार गाथा २६३) आ प्रमाणे हिंसादि पांचे पापोनां जे प्रमत्तयोग छे ते ज हिंसा छे, परंतुं प्रमत्तयोगशून्य केवळ बाह्य क्रिया ते हिंसा नथी. श्री कल्याणमंदिर स्तोत्रमां कह्युं छे के

यस्मात् क्रिया न प्रतिफलन्ति भावशून्याः । कारण के भावशून्य क्रियाओ हिंसा माटे या कर्मबंध माटे फलीभूत थती नथी.

व्रतना पालनमां क्रिया शरीरने आश्रये थाय छे. आ शारीरिक क्रियाथी जीवने पुण्यपाप के धर्म थतो नथी, कारण के ते क्रिया जीवना अधिकारमां नथी तथा ते क्रिया जीव करी शकतो ज नथी. पण ते क्रिया वखते अहिंसादिना जे विकल्प ऊठे छे ते राग पण जीवकृत अपराध होवाथी अर्थात् शुभराग होवाथी बंधनुं कारण छे, तेथी मात्र बाह्य हिंसादि (भाव) छूटवाथी पापनी निर्जरा थाय छेएम मानवुं ते योग्य नथी. (जुओ श्री नियमसार व्यवहार प्रकरण गाथा ५६ थी ५९) परंतु ते वखते सम्यग्द्रष्टि श्रावकने, जे अंतरंग मिथ्यात्व अने अनंतानुबंधी तथा अप्रत्याख्यान संबंधी क्रोधमानमायालोभनो अभाव छे, ते संवरनुं कारण छे अने त्यां स्वाश्रय अनुसार निर्जरा थाय छे.

अंतरंग शुद्धता छे ते निश्चयव्रत छे अने साथे जे शुभभाव छे ते व्यवहार व्रत छे अने ते निश्चयव्रतनुं निमित्त छे, केम के एकदेश वीतरागता साथे आवो व्यवहार हेयबुद्धिए होय छे.

मोक्षमार्गप्रकाशकमां पृष्ठ २६०मां कह्युं छे के

‘‘....बाह्य व्रतादिक छे ते तो शरीरादि परद्रव्याश्रित छे, अने परद्रव्यनो पोते कर्ता नथी, माटे तेमां कर्तृत्वबुद्धि पण न करवी तथा तेमां ममत्व पण न करवुं, ए व्रतादिकमां ग्रहणत्यागरूप पोतानो शुभोपयोग थाय छे ते पोताना आश्रये छे अने तेनो पोते कर्ता छे, माटे तेमां कर्तृत्वबुद्धि पण मानवी तथा त्यां ममत्व पण करवुं, परंतु ए शुभोपयोगने बंधनुं ज कारण जाणवुं पण मोक्षनुं कारण न जाणवुं; कारण के बंध अने मोक्षने तो प्रतिपक्षपणुं छे, तेथी एक ज भाव पुण्यबंधनुं पण कारण थाय अने मोक्षनुं पण कारण