Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

१. अविरमणरूप हिंसाकोई जीव पर जीवनी हिंसाना कार्यमां तो प्रवर्ततो नथी, परंतु तेने हिंसानो प्रतिज्ञापूर्वक त्याग नहि होवाथी तेने अंतरंगमां अविरतिनो भाव ऊभो छे; तेथी तेने अविरमणरूप हिंसानो दोष छे, जेम के कोईने कंदमूळनो त्याग नथी अने ते कोई वखते खातो पण नथी, छतां अंतरंगमां कंदमूळ खावानो भाव ऊभो होवाथी, ते भावनो त्याग नहि होवाथी तेने अविरमणरूप हिंसानो दोष लागे छे.

‘‘जे कार्य करवानी आशा रहे तेनी प्रतिज्ञा लेवाती नथी अने आशा रहे तेनाथी राग पण रहे छे तथा ए रागना भावथी कार्य कर्या विना पण अविरतिनो बंध थया ज करे छे; माटे प्रतिज्ञा अवश्य करवी योग्य छे. वळी कार्य करवानुं बंधन थया विना परिणाम केवी रीते रोकाशे? प्रयोजन पडतां तद्रूप परिणाम अवश्य थई जाय वा प्रयोजन विना पण तेनी आशा रहे छे, माटे प्रतिज्ञा करवी योग्य छे......’’

२. परिणमनरूप हिंसापर जीवना घातमां, जो जीव मनथी, वचनथी के कायथी प्रवर्ते तो तेने ते परिणमनरूप हिंसा छे.

आ बंने भेदोमां प्रमादसहित योगनुं अस्तित्व छे. तस्मात्प्रमत्तयोगे नित्यं प्राणव्यपरोपणम् । तेथी प्रमादना योगमां निरंतर प्राणघातनो सद्भाव छे. ज्यारे जीव क्रोधादि भावहिंसानो त्याग करी प्रमादरूप परिणमन न करे तो ज तेने (प्राणघातनो) अभाव होई शके. ज्यां सुधी प्रमाद रहे छे त्यां सुधी हिंसानो अभाव कोई रीते होई शकतो नथी.

प्रमत्तयोग ए ज हिंसानुं वास्तविक कारण छे; केवळ द्रव्यप्राणनो घात थवो ते खरी हिंसा नथी.

श्री उमास्वामीए पण ‘तत्त्वार्थ सूत्र’मां हिंसानुं लक्षण आपतां कह्युं छे के प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा । प्रमादना योगथी यथासंभव द्रव्यप्राण या भावप्राणनो घात करवो ते हिंसा छे.

वळी समयसार गाथा २६२मां कह्युं छे के

‘‘जीवोने मारो के न मारो, कर्मबंध अध्यवसानथी (ऊंधी मान्यता साथे पापभावथीप्रमत्तयोगथी) थाय छे.’’ १. मोक्षमार्ग प्रकाशकगुजराती आवृत्ति, अध्याय ७, पृष्ठ २१०. २. जुओ पुरुषार्थसिद्धिउपाय, श्लोक ४८ अने तेनो भावार्थ.