Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १४९

पोताना शुद्धोपयोगरूप भावप्राणनो घात थयो. आ हिंसा तो पोताना भावप्राणनी व्यपरोपणथी थई. ते तो (द्रव्यहिंसा) पहेलां ज थई, बीजी (द्रव्य) हिंसा थाय के न पण थाय. पाछळथी कदाचित् तीव्र कषायरूप थाय अने पोताना दीर्घ श्वासादिथी अथवा हाथ -पग वडे पोताना अंगने पीडा उपजावी अथवा आपघात करी मरी गयो, ते पोताना द्रव्यप्राणना घातरूप हिंसा थई.

वळी जे कषायथी अन्य जीवने कुवचन कह्यां, मर्मभेदी हास्य कर्युं अथवा जे रीते तेनुं अंतरंग पीडित थई कषायरूपे परिणमे तेवुं कार्य कर्युं. त्यां परना भावप्राणना व्यपरोपण (घात)थी हिंसा थाय छे. ज्यां कषायना वशे प्रमादी थयो, बीजा जीवना शरीरने पीडा करी अथवा प्राणनाश कर्यो त्यां परना द्रव्यप्राणना घातथी (परना द्रव्यप्राणनी) हिंसा थई.....’’

‘‘महापुरुष ध्यानमां लीन छे अथवा गमनादिमां सावधानताथी यत्नपूर्वक प्रवर्ते छे अने कदाच एना शरीरना संबंधथी कोई जीवना प्राण पीडाया तोपण एने हिंसानो दोष नथी, केम के एना परिणाममां कषाय हतो नहि, तेथी पर जीवना प्राणने पीडा थाय तोपण हिंसा नाम पामे नहि.....’’

‘‘जे प्रमादी जीव कषायने वश थईने गमनादि क्रियामां यत्नरूप प्रवर्ततो नथी अथवा बेसतांऊठतां क्रोधादि भावोमां परिणमे छे तो त्यां जीव कदाच मरे के न मरे पण एने तो कषायभाव वडे अवश्य हिंसानो दोष लागे छे; एटले पर जीवना प्राणनी पीडा न थवा छतां पण प्रमादना सद्भावथी हिंसा नाम पामे छे......’’

‘‘कारण के जीव कषायभावो सहित होवाथी पहेलां पोता वडे ज पोताने हणे छे अने पछीथी भले बीजा जीवोनी हिंसा थाय के न थाय.....’’

‘‘पर जीवना घातरूप जे हिंसा थाय छे ते बे प्रकारनी छेएक अविरमणरूप (अविरतिरूप) अने बीजी परिणमनरूप. १. पुरुषार्थसिद्धिउपाय, गुजराती आवृत्ति श्लोक ४३नो भावार्थ. २. पुरुषार्थसिद्धिउपाय, गुजराती आवृत्ति श्लोक ४५नो भावार्थ. ३. पुरुषार्थसिद्धिउपाय, गुजराती आवृत्ति श्लोक ४६नो भावार्थ. ४. पुरुषार्थसिद्धिउपाय, गुजराती आवृत्ति श्लोक ४७नो भावार्थ.