Ratnakarand Shravakachar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

रत्नकरंडक श्रावकाचार
[ १६९

‘फलन्ति’ फलं प्रयच्छन्ति के ते ? ‘पंचाणुव्रतनिधयः’ पंचाणुव्रतन्येव निधयो निधानानि कथंभूतानि ? ‘निरतिक्रमणा’ निरतिचाराः किं फलन्ति ? ‘सुरलोकं’ यत्र सुरलोके ‘लभ्यन्ते’ कानि ? ‘अवधिरवधिज्ञानं’ ‘अष्टगुणा’ अणिमामहिमेत्यादयः ‘दिव्यशरीरं च’ सप्तधातुविवर्जितं शरीरं एतानि सर्वाणि यत्र लभ्यन्ते ।।६३।।

इह लोके किं न कस्याप्यहिंसाद्यणुव्रतानुष्ठानफलप्राप्तिर्द्दष्टा येन परलोकार्थं तदनुष्ठीयते इत्याशंक्याह अणुव्रतरूपी निधिओ [सुरलोकम् ] स्वर्गलोकनुं [फलन्ति ] फळ आपे छे. [यत्र ] ज्यां [अवधिः ] अवधिज्ञान, [अष्टगुणाः ] आठ ॠद्धिओ [च ] अने [दिव्यशरीरम् ] सात धातुओथी रहित सुंदर वैक्रियिक शरीर [लभ्यन्ते ] प्राप्त थाय छे.

टीका :फलन्ति’ फळ आपे छे. कोण ते? पंचाणुव्रतनिधयाः’ पांच अणुव्रतरूपी निधिओ. केवी (निधिओ)? निरतिक्रमाः’ अतिचाररहित, शुं फळ आपे छे? सुरलोकं’ सुरलोकनुं (स्वर्गलोकनुं). ज्यां एटले सुरलोकमां प्राप्त थाय छे ते शुं? अवधि’ अवधिज्ञान, अष्टगुणाः’ अणिमा, महिमा इत्यादि आठ ॠद्धिओ अने दिव्यशरीरम्’ सात धातुथी रहित दिव्य शरीरए सर्वे ज्यां प्राप्त थाय छे.

भावार्थ :अतिचाररहित पांच अणुव्रतनुं पालन करवाथी स्वर्गलोकनी प्राप्ति थाय छे. त्यां अवधिज्ञान, अणिमा, महिमा, गरीमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व अने वशित्वए आठ ॠद्धिओ अने सात धातुओ रहित दिव्य वैक्रियिक शरीर प्राप्त थाय छे.

आ गाथा उपरथी सिद्ध थाय छे के निरतिचार अणुव्रतनुं फळ संवरनिर्जरा नथी, पण तेनाथी पुण्यबंध छे, केम के स्वर्गगति कांई वीतराग धर्मनुं फळ नथी, परंतु ते शुभभावनुं फळ छे.

धर्मी जीवने पांचमा गुणस्थानके आवा शुभभाव आव्या वगर रहेता नथी, परंतु ते तेमने श्रद्धामां हेय समजे छे. ६३.

आ लोकमां शुं कोईने पण अहिंसादि अणुव्रतनुं पालन करवाथी फळप्राप्ति देखाई, जेथी परलोकने माटे तेनुं अनुष्ठान करवामां आवे छे? एवी आशंका करी कहे छे १. किं कस्याप्य घ