९८समाधितंत्र
‘‘ते ज्ञानस्वभावरूप ज्योति अविद्यानो – अज्ञाननो नाश करनार छे तथा महान उत्कृष्ट अने ज्ञानमय छे; माटे मुमुक्षुओए तेना विषयमां ज पूछवुं, तेनी प्राप्तिनी अभिलाषा करवी तथा तेनो अनुभव करवो.’’१
वळी श्री अमितगति आचार्यकृत ‘योगसार’मां कह्युं छे केः —
‘‘जे पुरुष विद्वान छे तेने ते आत्म – पदार्थनुं निश्चल मनथी अध्ययन करवुं योग्य छे; ते ध्यान करवा योग्य, आराधना करवा योग्य, पूछवा योग्य, सांभळवा योग्य, अभ्यास योग्य, उपार्जन करवा योग्य, जाणवा योग्य, कहेवा योग्य, प्रार्थना योग्य, शिक्षायोग्य, देखवा योग्य अने स्पर्शवा योग्य छे, कारण के तेम करवाथी आत्मा सदा स्थिरपणाने पामे छे.’’२ ५३
वाणी – शरीरथी भिन्न आत्मानो असंभव होवाथी तेने विषे बोलवुं (पृच्छा करवी) इत्यादि योग्य नथी – एम बोलनार प्रति कहे छेः —
अन्वयार्थ : — (वाक्शरीरयोः भ्रान्तः) वचन अने शरीरमां जेने आत्मभ्रान्ति छे तेवो बहिरात्मा, (वाचि शरीरे च) वचन अने शरीरमां (आत्मानं संधत्ते) आत्मानुं आरोपण करे छे अर्थात् वचन अने शरीरने आत्मा माने छे; (पुनः) परंतु (अभ्रान्तः) वचन अने १. जुओ – इष्टोपदेश – श्लोक ४९
२. अध्येतव्यं स्तिमितमनसा ध्येयमाराधनीयं
दृश्यं स्पृश्यं प्रभवति यतः सर्वदात्मस्थिरत्वम् ।।४९।। [श्री अमितगति आचार्यकृत योगसार – श्लोक ४९]