Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र९७

आत्मस्वरूपभावनादरपरो भवेत् येनात्मस्वरूपेणेत्थं भावितेन अविद्यामयं स्वरूपं बहिरात्मस्वरूपम् त्यक्त्वा विद्यामयं रूपं व्रजेत् ।।५३।।


करवो; जेथी, एटले आवी रीते आत्मस्वरूपनी भावना करवाथी, अविद्यामय स्वरूपनो एटले बहिरात्मस्वरूपनो त्याग करीने विद्यामय रूप एटले के परमात्मस्वरूप प्राप्त कराय.

भावार्थ :आत्मस्वरूपनी भावना केवी रीते करवी? ते प्रश्नना उत्तरमां आचार्य आत्मार्थीने उद्देशीने कहे छे केः

आत्मस्वरूप बीजाओने समजाववुं, जेमणे आत्मस्वरूप जाण्युं छे तेमने तेना ज विषे पूछी ते जाणवुं, तेनी ज इच्छा राखवी अर्थात् तेने एकने ज परमार्थ सत्य मानवुं अने आत्मस्वरूपनी भावनामां ज निरंतर लाग्या रहेवुं. आम करवाथी बहिरात्मस्वरूपनो अविद्यामय स्वरूपनो नाश थशे. परमात्मस्वरूपनी एटले ज्ञानमय स्वरूपनी प्राप्ति थशे.

विशेष

(१) आत्मा संबंधी ज वात कर, संसार संबंधी कांई पण वात न कर. तेम करवाथी बहारमां भमतो तारो उपयोग तत्त्वनिर्णय तरफ वळशे.

(२) आत्मा संबंधी वधु ज्ञान माटे विशेष ज्ञानीओने पूछ; तेथी आत्मा संबंधी तारी श्रद्धा स्पष्ट थईने द्रढ थशे अने ज्ञान निर्मळ थशे.

(३) आत्मप्राप्तिनी ज भावना कर, बीजा कोई पर पदार्थनी के इन्द्रियविषयना सुखनी इच्छा न कर; एम करवाथी बाह्य इन्द्रियसुखनी पाछळ थती निरर्थक आकुळता मटी जशे.

(४) आत्मस्वरूपनी भावनामां ज निरंतर अभिरत बन. आवी रीते ज्ञानमां, श्रद्धामां अने आचारमां एक आत्माने ज विषय बनाव; बीजा कोई बाह्य पदार्थने तारा ज्ञाननो विषय न बनाव. श्रीमद् राजचन्द्रे कह्युं छे केः

‘काम एक आत्मार्थनुं, बीजो नहि मनरोग.’

आत्मा ज एक प्रयोजनभूत वस्तु छे. तेनी प्राप्ति ज करवा योग्य छे. ते सिवाय अन्य पदार्थोनो विचार मनना रोग समान छे.

एवी रीते समजीने धगश अने उत्साहपूर्वक जो तुं आत्मभावना करीश, तो अविद्यानोअज्ञानतानो नाश थशे अने आत्मस्वरूपनी प्राप्ति थशे. १. जुओश्रीमद् राजचंद्रकृत ‘आत्मसिद्धि’.