Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 57.

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१०४समाधितंत्र

पश्येन्निरंतरं देहमात्मनोऽनात्मचेतसः
अपरात्मधियाऽन्येषामात्मतत्त्वे व्यवस्थितः ।।५७।।

टीकाआत्मनो देहमात्मसम्बन्धिशरीरं अनात्मचेतसा इदं ममात्मा न भवतीति बुद्ध्या अन्तरात्मा पश्येत् निरन्तरं सर्वदा तथा अन्येषां देहं परेषामात्मा न भवतीति बुद्ध्या पश्येत् किं विशिष्टः ? आत्मतत्त्वे व्यवस्थितः आत्मस्वरूपनिष्ठः ।।५७।।

श्लोक ५७

अन्वयार्थ :ज्ञानीए (आत्मतत्त्वे) आत्मस्वरूपमां (व्यवस्थितः) स्थित थई (आत्मनः देहं) पोताना शरीरने (अनात्मचेतसा) ‘आ मारो आत्मा नथी’ एवी बुद्धिथी (निरंतरं पश्येत्) निरंतर जोवुंअनुभववुं अने (अन्येषां) बीजा जीवोना शरीरने पण (अपरात्मधिया) ‘आ बीजानो आत्मा नथी’ एवी बुद्धिथी (पश्येत्) सदा अवलोकवुं.

टीका :पोताना शरीरने एटले आत्मा साथे संबंध राखनार शरीरने, अनात्मबुद्धिए अर्थात् ‘आ मारो आत्मा नथी’ एवी बुद्धिए अन्तरात्माए निरंतरसर्वदा देखवुं (अनुभववुं) तथा बीजाओना देहने, ‘ए परनो आत्मा नथी’ एवी बुद्धिए जोवुं. केवा थईने (तेम करवुं)? आत्मतत्त्वमां, व्यवस्थित थईने एटले आत्मस्वरूपमां स्थित थईने (तेम करवुं).

भावार्थ :ज्ञानीए आत्मस्वरूपमां स्थित थईने पोताना शरीरने अनात्मबुद्धिए निरंतर जोवुंअनुभववुं अर्थात् ‘आ शरीर ते मारो आत्मा नथी’ एवी भेदबुद्धिथी सदा जाणवुं. बीजाना शरीरने पण तेवी भेदबुद्धिथी देखवुंअर्थात् बीजानुं शरीर ते तेनो आत्मा नथी एम भेदबुद्धिए सदा देखवुं.

विशेष

आचार्य उपदेशरूपे कहे छेः

‘हे जीव, तुं अनादिथी शरीरादि बाह्य पदार्थोमां आत्मबुद्धि करी संसारमां रखडी दुःखी थयो, पण हवे सुखी थवुं होय तो देहमां आत्मबुद्धिनो त्याग करी आत्मस्वरूपमां स्थिर था, अर्थात् बहिरात्मपणुं छोडी दई हवे अन्तरात्मा बन. तारो आत्मा चैतन्यस्वरूप छे अने तारुं शरीर तो अचेतन छे. ए तारुं स्वरूप नथी, छतां तुं तेने तारो आत्मा माने छे अने

आत्मतत्त्वमां स्थित थई नित्य देखवुं एम,
मुज तन ते मुज आत्म नहि, पर तननुं पण तेम. ५७.