नन्वेवमात्मतत्त्वं स्वयमनुभूय मूढात्मनां किमिति न प्रतिपाद्यते येन तेऽपि तज्जानन्त्विति वदन्तं प्रत्याह —
टीका — मूढात्मानो मां आत्मस्वरूपमज्ञापितमप्रतिपादितं यथा न जानन्ति मूढात्मत्वात् । तेनी क्रिया तुं करी शके छे एम माने छे – ए तारो भ्रम छे. ए भ्रम हवे छोडी दे अने तारा शरीरने सदा अनात्मबुद्धिए जो, एटले के ते पर छे एम जो; ते तुं छे एवी आत्मबुद्धिथी न जो. तारा आत्माने शरीरादिथी निरंतर भिन्न अनुभव करे, बंनेनी एकताबुद्धि छोडी दे. तुं तारा शरीरना संबंधमां जेवी भूल करे छे तेवी ज भूल बीजा जीवोना शरीरना संबंधमां पण करे छे. तुं तेमना शरीरने पण तेमनो आत्मा माने छे. माटे तेमना आत्माने पण तेमना शरीरथी भिन्न जाण. शरीरने शरीर जाण अने आत्माने आत्मा जाण.
‘स्व – स्वरूपमां स्थिर थई ज्यां सुधी तुं स्व – परनुं भेदज्ञान करीश नहि त्यां सुधी शरीरादि पर पदार्थो साथे तारी आत्मबुद्धि – एकताबुद्धि – ममत्वबुद्धि – कर्ताबुद्धि थया वगर रहेशे नहि अने तारा दुःखनो अंत आवशे नहि. माटे बहिरात्मपणुं छोडी आत्मस्वरूपमां स्थिर था. ए ज सुखनो उपाय छे.’ ५७.
एवी रीते आत्मतत्त्वने स्वयं अनुभवीने मूढ आत्माओने केम समजावता नथी, जेथी तेओ पण ते जाणे? एवुं बोलनार प्रति कहे छेः —
अन्वयार्थ : — ज्ञानीओ विचारे छे के – (यथा) जेम (मूढात्मानः) मूर्ख अज्ञानी जीवो (अज्ञापितं) जाण कराव्या विना (मां) मने एटले मारा आत्मस्वरूपने (न जानन्ति) जाणता नथी, (तथा) तेम (ज्ञापितं) जाण कराव्या छतां पण (न जानन्ति) जाणता नथी (ततः) तेथी (तेषां) तेमने – ए मूढ जीवोने(मे ज्ञापनश्रमः) बोध करवानो मारो परिश्रम (वृथा) व्यर्थ छे – निष्फळ छे.
टीका : — जेम मूढ आत्माओ मने एटले आत्मस्वरूपने, वगर कह्ये (वगर