१०६समाधितंत्र तथा ज्ञापितमपि मां ते मूढात्मत्वादेव न जानन्ति । ततः तेषां सर्वथा परिज्ञानाभावात् । तेषां मूढात्मनां सम्बंधित्वेन वृथा मे ज्ञापनश्रमो विफलो मे प्रतिपादनप्रयासः ।।५८।। समजाव्ये) मूढात्मपणाने लीधे जाणता नथी, तेम कह्यां छतां पण तेओ मने (आत्मस्वरूपने) मूढात्मपणाने लीधे ज जाणता नथी; तेथी तेमने सर्वथा परिज्ञाननो अभाव होवाथी ते मूढात्माओना संबंधमां बोध करवानो (तेमने कहेवानो) मारो श्रम वृथा (व्यर्थ) छे, अर्थात् तेमने ते स्वरूप समजाववानो मारो प्रयास विफल (फोगट) छे.
भावार्थ : — आत्मानुभवी ज्ञानी जीव विचारे छे के – जेम मूढ जीवो अज्ञानताने लीधे वगर समजाव्ये आत्मस्वरूप जाणता नथी, तेम तेमने आत्मस्वरूप समजाववामां आवे, तोपण तेओ मूढपणाने लीधे समजवाना नथी; तेथी तेमने आत्मस्वरूप समजाववानो प्रयत्न व्यर्थ छे; कारण के तेमनी बाबतमां समजावो के न समजावो – बेउ सरखुं छे.
ज्ञानीओ मूर्ख जीवोने आत्मस्वरूप समजाववामां उदासीन होय छे, कारण केः —
(१) मूर्ख जीवो बहिर्मुख होय छे. तेमनी द्रष्टि बाह्य विषयो तरफ ज होय छे. तेमने आत्मस्वरूप जाणवानी बिलकुल जिज्ञासा के रुचि होती नथी. तेओ सदा विषयोमां ज रत होय छे.
(२) ‘हुं बीजाओने समजावी दउं’ एवी बुद्धि ज्ञानीओने होती नथी, कारण के तेओ जाणे छे के कोई कोईने समजावी शके नहि. तेमने बराबर ख्यालमां छे के दरेक पदार्थ पोतपोतानी मर्यादामां स्वयं परिणमे छे, कोई कोईने आधीन नथी. तेम कोई पदार्थ कोईनो परिणमाव्यो परिणमतो नथी.१ एक द्रव्य बीजा द्रव्यनुं कांई करी शकतुं नथी एवो विश्वनो अफर नियम छे. तेथी पर संबंधमां तेमने बिलकुल कर्ता – बुद्धि नथी.
(३) अस्थिरताने लीधे ज्ञानीने बीजाने समजाववानो कदाच विकल्प ऊठे, पण अभिप्रायमां तेनो निषेध छे, कारण के भाषा – वर्गणानुं परिणमन विकल्पथी निरपेक्ष छे – स्वतंत्र छे. विकल्पना कारणे उपदेश वाणी नीकळे छे एम तेओ कदी मानता नथी.
(४) मारुं स्वरूप तो जाणवुं – देखवुं ते ज छे. ए सिवाय हुं बीजुं कांई न करी शकुं. जो कांई करवानो विकल्प ऊठे तो राग उत्पन्न थाय. वाणीनो तो हुं कदी कर्ता छुं ज नहि अने वास्तवमां विकल्पनो पण कर्ता नथी. १. जुओ – मोक्षमार्ग प्रकाशक – गु. आवृत्ति पृ. ९२; ३०८