(५) चैतन्यस्वरूप स्वसंवेदनगम्य छे; वाणी के विकल्प द्वारा ते बीजाने समजावी शकाय तेवुं नथी.
माटे ज्ञानी मुख्यतया बीजाओने उपदेश देवानी प्रवृत्तिमां पडता नथी. तेओ तो सदा पोतानुं आत्महित साधवामां ज तत्पर रहे छे. कदाच उपदेशादिनी वृत्ति ऊठे तो तेनी मुख्यता नथी; ते वखते पण तेमने चैतन्यस्वरूपनी ज भावना होय छे.
परोपदेशनी प्रवृत्तिनो विकल्प – ए शुभ राग छे. ते आत्मस्वरूपनी प्राप्तिमां बाधारूप छे. माटे आ रागना व्यामोहमां पडी ज्ञानी कदी आत्महित भूलता नथी.
‘‘जगतमां जीवो, तेमना कर्म, तेमनी लब्धिओ, वगेरे अनेक प्रकारनां छे. तेथी सर्व जीवो समान विचारना थाय ते बनवुं असंभवित छे. माटे पर जीवोने समजावी देवानी आकुळता करवी योग्य नथी. स्वात्मावलंबनरूप निज हितमां प्रमाद न थाय एम रहेवुं ए ज कर्तव्य छे.’’१ ५८.
वळीः —
अन्वयार्थ : — (यत्) जेने विकल्पाधिरूढ आत्मस्वरूपने अथवा देहादिकने – (बोधियितुं) समजाववाने (इच्छामि) हुं इच्छुं छुं (तत्) ते (न अहं) हुं नथी अर्थात् आत्मानुं वास्तविक स्वरूप नथी. (पुनः) वळी (यत्) जे एटले ज्ञानानंदमय स्वयं अनुभवगम्य आत्मस्वरूप (अहं) हुं छुं (तदपि), ते पण (अन्यस्य) बीजाने (ग्राह्यं न) ग्राह्य नथी; (तत्) तेथी (अन्यस्य) बीजाने (किं बोधये) हुं शो बोध करुं? १. छे जीव विधविध, कर्म विधविध, लब्धि छे विधविध, अरे!