Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 70.

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१२४समाधितंत्र

गौरः स्थूलः कृशो वाऽहमित्यङ्गे नाविशेषयन्
आत्मानं धारयेन्नित्यं केवलज्ञप्तिविग्रहम् ।।७०।।

टीकागौरौऽहं स्थूलोऽहं कृशोवाऽहमित्यनेन प्रकारेणाङ्गेन विशेषणेन अविशेषयन् विशिष्टं अकुर्वन्नात्मानं धारयेत् चित्तेऽविचलं भावयेत् नित्यं सर्वदा कथम्भूतं ? केवलज्ञप्तिविग्रहं केवलज्ञानस्वरूपं अथवा केवला रूपादिरहिता ज्ञप्तिरेवोपयोग एव विग्रहः स्वरूपं यस्य ।।७०।।

यश्चैवं विधमात्मानमेकाग्रमनसा भावयेत्तस्यैव मुक्तिर्नान्यस्येत्याह

श्लोक ७०

अन्वयार्थ :(अहं) हुं (गौरः) गोरो छुं, (स्थूलः) जाडो छुं, (वा कृशः) अथवा पातळो (इति) एवी रीते (अंगेन) शरीर साथे (आत्मानं) आत्माने (अविशेषयन्) एकरूप नहि करतां (नित्यं) सदा (आत्मानं) पोताना आत्माने (केवलज्ञप्तिविग्रहम्) केवल ज्ञानरूप शरीरवाळो (धारयेत्) धारवोमानवो.

टीका :हुं गोरो छुं, हुं स्थूल (जाडो) छुं के हुं कृश (पातळो) छुंएवा प्रकारे शरीर वडे आत्माने, विशेषरूपे एटले विशिष्टरूपे नहि मानी (तेने) धारवो अर्थात् चित्तमां तेने नित्यसर्वदा अविचलपणे भाववो. केवा (आत्माने)? केवल ज्ञानविग्रहरूप एटले केवल ज्ञानस्वरूप अर्थात् केवल रूपादिरहित ज्ञप्ति जउपयोग ज जेनुं विग्रह एटले स्वरूप छे तेवा आत्माने (चित्तमां धारवो).

भावार्थ :गोरापणुं, स्थूलपणुं, कृशपणुं वगेरे अवस्थाओ शरीरनी छेपुद्गलनी छे, आत्मानी नथी. आ शरीरनी अवस्थाओ साथे आत्माने एकरूप नहि मानवो अर्थात् ते अवस्थाओने आत्मानुं स्वरूप नहि मानवुं. तेने शरीरथी भिन्न, रूपादिरहित अने केवल ज्ञानस्वरूप ज समजवो अने ते स्वरूपे ज तेनुं निरंतर चित्तमां ध्यान करवुं. ७०.

जे एवा प्रकारना आत्मानी एकाग्र मनथी भावना करे तेने ज मुक्ति होय छे. बीजा कोईने नहिते कहे छेः

हउँ गोरउ हउँ सांभलउ हउँ जि वभिण्णउ वण्णु
हउँ तणु अंगउँ थूलु हउँ एहउँ मुढउ मण्णु ।।८०।।(श्री परमात्मप्रकाशेयोगीन्द्रदेवः)
हुं गोरो कृश स्थूल ना, ए सौ छे तनभाव,
एम गणो, धारो सदा आत्मा ज्ञानस्वभाव. ७०.