Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समाधितंत्र१२३

कालान्तरावस्थायित्वेन एकक्षेत्रावस्थानेन वा भ्रान्तिर्देहात्मनोरभेदाध्यवसायस्तया ।।६९।।

ततो यथावदात्मस्वरूपप्रतिपत्तिमिच्छन्नात्मानं देहाद्भिन्नं भावयेदित्याह आत्मानी साथे समान अवगाहथी एक क्षेत्रवाळा (देहमां). आवा देहमां जे स्थिति भ्रान्तिस्थितिथी एटले कालान्तरअवस्थायिपणाने लीधे या एक क्षेत्रमां रहेवाना कारणेजे भ्रान्ति अर्थात् देह अने आत्माना अभेदरूप अध्यवसायतेना कारणे (देहने आत्मा माने छे).

भावार्थ :निरंतर प्रवेश करता अने बहार नीकळता पुद्गलपरमाणुओना समूहरूप देहमां समान आकृतिएएक क्षेत्रे आत्मा स्थित होवाथी, देह अने आत्मानी एकपणानी भ्रान्तिने लीधे बहिरात्मा शरीरने ज आत्मा माने छे.

आ शरीर पुद्गल परमाणुओनुं बनेलुं छे, आ परमाणुओ तेना ते कायम रहेता नथी. समये समये अगणित परमाणुओ शरीरनी बहार नीकळे छे अने नवा नवा परमाणुओ शरीरनी अंदर दाखल थाय छे. परमाणुओना नीकळी जवाथी तथा बीजानो प्रवेश थवाथी शरीरनी बाह्य आकृतिमां स्थूल द्रष्टिए कांई फेर लागतो नथी. वळी आत्मा अने शरीरने एकक्षेत्रावगाह संयोग संबंध छे, तेथी बंनेनी समान आकृति होवाथी अज्ञानी जीवने भ्रम थाय छे के ‘आ शरीर ज हुं छुं.’ तेने अभ्यंतर रहेला आत्मतत्त्वनुं ज्ञान ज नथी.

शरीर अने आत्माने दूधपाणीनी जेम एकक्षेत्रावगाह स्थिति छे. शरीर इन्द्रियगम्य छे अने आत्मा अतीन्द्रियगम्य छे. अज्ञानीने इन्द्रियज्ञान होवाथी ते शरीरने ज देखे छे, आत्माने देखतो नथी; तेथी ते शरीरने ज आत्मा मानी एकताबुद्धि करे छे अने शरीर संबंधी रागद्वेष करे छे.

विशेष

‘‘ज्यां सुधी आ आत्माने ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, भावकर्म अने शरीरादि नोकर्ममां ‘आ हुं छुं’ अने हुंमां (आत्मामां) ‘आ कर्मनोकर्म छे’एवी बुद्धि छे, त्यां सुधी आ आत्मा अप्रतिबुद्ध (अज्ञानी) छे.’’

श्लोकमां कर्मना कारणे जीव भ्रममां पडे छे एम कह्युं नथी, पण पोताना अपराधथी ज ते तेवा भ्रममां पडे छे. ६९.

तेथी यथार्थरूपे आत्मस्वरूपने समजवानी इच्छा करनारे आत्माने देहथी भिन्न भाववो. ते कहे छेः १. नोकर्मकर्मे ‘हुं’, हुंमां वळी ‘कर्म’ ने नोकर्म छे,’

ए बुद्धि ज्यां लगी जीवनी, अज्ञानी त्यां लगी ते रहे. (१९)
(श्री समयसारगु. आवृत्तिगा. १९.)
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