Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 69.

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१२२समाधितंत्र

यद्यात्मनः स्वरूपमात्मत्वेन बहिरात्मानो न बुद्ध्यन्ते तदा किमात्मत्वेन ते बुद्धयन्ते इत्याह

प्रविशद्गलतां व्यूहे देहेऽणूनां समाकृतौ
स्थितिभ्रान्त्या प्रपद्यन्ते तमात्मानमबुद्ध्यः ।।६९।।

टीकातं देहामात्मानं प्रपद्यन्ते के ते ? अबुद्धयो बहिरात्मानः कया कृत्वा ? स्थितिभ्रान्त्या क्व ? देहे ? कथम्भूते देहे ? व्यूहे समूहे केषां ? अणूनां परमाणूनां किं विशिष्टानां ? प्रविशद्गलतां अनुप्रविशतां निर्गच्छतां च पुनरपि कथम्भूते ? समाकृतौ समानाकारे सदृशपरापरोत्पादेन आत्मना सहैकक्षेत्रे समानावगाहेन वा इत्थम्भूते देहे या स्थितिभ्रान्तिः स्थित्या थएलाओने मोहसहित कर्मोदय व्यवहारथी निमित्त थाय छे, पण निश्चयथी तो पोतानो रागादि अज्ञान भाव ज अशुद्ध उपादान कारण छे.’’ ६८.

जो बहिरात्माओ आत्मस्वरूपने आत्मपणे न जाणता होय, तो तेओ कोने आत्मपणे जाणे छे? ते कहे छेः

श्लोक ६९

अन्वयार्थ :(अबुद्धयः) अज्ञानी बहिरात्मा जीवो, (प्रविशद् गलतां अणूनां व्यूहे देहे) प्रवेश करता अने बहार नीकळताएवा परमाणुओना समूहरूप देहमां, (समाकृतौ) आत्मा अने शरीरनी आकृतिना समानरूपमां (स्थितिभ्रान्त्या) आत्मा स्थित होवाथीअर्थात् शरीर अने आत्मा एक क्षेत्रमां स्थित होवाथीबंनेने एकरूप समजवानी भ्रान्तिथी (तम्) तेने एटले शरीरने (आत्मानं) आत्मा (प्रतिपद्यते) समजी ले छे.

टीका :तेओ देहने आत्मा समजे छे. कोण तेओ? बुद्धि विनाना बहिरात्माओ. शाथी (एम समजे छे)? स्थितिनी भ्रान्तिथी. शामां? देहमां. केवा देहमां? व्यूहरूप एटले समूहरूप (देहमां). कोना (समूहरूप)? अणुओनापरमाणुओना (समूहरूप). केवा प्रकारना (परमाणुओना)? प्रवेशतागलता अर्थात् प्रवेश करता अने नीकळता (परमाणुओना). वळी केवा (देहमां)? समाकृतएकबीजाना सद्रश उत्पादथी समान आकारवाळा (देहमां)अर्थात् १. जुओश्री समयसार गा. १६४१६५नी श्री जयसेनाचार्यकृत संस्कृत टीका.

अस्थिर अणुनो व्यूह छे सम-आकार शरीर,
स्थितिभ्रमथी मूरख जनो ते ज गणे छे जीव. ६९.