शरीरसामान्योपादानेऽप्यत्र कार्मणशरीरमेव गृह्यते । तस्यैव मुख्यवृत्त्या तदावरकत्वोपपत्तेः । इत्थंभूतो
बहिरात्मा नात्मानं बुध्यते । तस्मादात्मस्वरूपानवबोधाम् अतिचिरं बहुतरकालं भवे संसारे
भ्रमति ।।६८।।
शरीरनुं ज ग्रहण समजवुं, कारण के तेनी ज मुख्य वृत्तिए तेना आवश्यकपणानी उपपत्ति छे अर्थात् ते आवरणरूप छे.] एवो बहिरात्मा आत्माने जाणतो नथी; तेथी आत्मस्वरूप नहि जाणवाना कारणे ते अति चिरकाळ – बहु बहु काळ सुधी भवमां एटले संसारमां भमे छे.
भावार्थ : — वास्तवमां आत्मा ज्ञानस्वरूप छे. ज्ञान ज तेनुं शरीर छे, परंतु अनादि काळथी संसारी आत्माने कार्मण शरीर साथे एकपणाना अध्यासथी तेनुं स्वरूप विकृत थई गयुं छे. तेवा बहिरात्माने आत्माना यथार्थस्वरूपनुं ज्ञान नथी, तेथी ते संसारमां चिरकाळ सुधी भम्या करे छे.
अहीं कांचळीनुं द्रष्टांत स्थूलतानी अपेक्षाए छे, कारण के जेवी रीते कांचळी सर्पना उपरना भागमां रहे छे, तेवी रीते कार्मण शरीरनो संबंध आत्मा साथे नथी, परंतु पाणीमां निमक जेम मळी जाय छे, तेम बंनेनो एकक्षेत्रावगाहरूप संबंध छे.१
आत्मा अने कर्मनो संबंध अनादि काळथी छे, पण ते प्रवाहरूपे छे. ज्यारे अज्ञानवश जीव कर्मना उदयमां जोडाय छे ते ज समये उदयमां आवेलां कर्म खरे छे अने नवां कर्म स्वयं बंधाय छे. एम कर्म – संतति प्रवाहरूपे चालु रहे छे. जो जीव कर्मना उदयमां न जोडाय तो नवां कर्म बंधातां नथी अने जूनां कर्म खरी जाय छे.
ज्यां सुधी जीव पोतानी विपरीत मान्यता टाळतो नथी, त्यां सुधी दर्शनमोहनीय कर्मनो प्रवाह चालु रहे छे अने जीव तेना उदयमां जोडातो रहे छे, अने तेथी संसारमां रखड्या ज करे छे.
‘‘द्रव्य प्रत्ययोनो उदय थतां, शुद्धात्मस्वरूपनी भावनानो त्याग करीने (जीव) ज्यारे रागादिभावे परिणमे छे त्यारे बंध थाय छे, उदयमात्रथी नहि ज. जो उदयमात्रथी बंध थाय तो सर्वदा संसार ज रहे. केवी रीते? संसारीओने सर्वदा ज कर्मोदयनुं विद्यमानपणुं होय छे माटे. तो शुं कर्मोदय बंधनुं कारण नथी थतुं? ना, निर्विकल्प समाधिथी भ्रष्ट १. सर्पनी कांचळी तेना शरीरथी जुदी थवा योग्य न होय त्यां सुधी ते सर्पना शरीर साथे संलग्न (चोंटेली)
रहे छे; जेम सर्पनी कांचळी तेना शरीर साथे चालु रहे छे तेम.